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संवैधानिक मर्यादाओं की बलि: क्या बंगाल में ‘दीदी’ का कद देश के राष्ट्रपति से भी बड़ा हो गया है?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बंगाल दौरे पर ममता बनर्जी की अनुपस्थिति और प्रशासनिक बाधाओं पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने मुख्यमंत्री को 'छोटी बहन' बताते हुए नाराजगी की बात कही।

पश्चिम बंगाल की सियासत में अहंकार और प्रोटोकॉल की जंग अब उस मुकाम पर पहुँच गई है जहाँ देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को भी दांव पर लगा दिया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का हालिया बंगाल दौरा केवल एक सरकारी प्रवास नहीं रह गया, बल्कि इसने राज्य सरकार की उस कड़वाहट को उजागर कर दिया है जो अब मर्यादाओं की सीमा लांघ रही है। जब देश की राष्ट्रपति खुद को ‘बंगाल की बेटी’ बताते हुए मुख्यमंत्री को अपनी ‘छोटी बहन’ कहें और बदले में उन्हें केवल खाली कुर्सियाँ और मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति मिले, तो समझ लेना चाहिए कि राज्य की राजनीति में स्वस्थ परंपराएँ दम तोड़ चुकी हैं।

सिल्लगीगुड़ी के संथाल सम्मेलन में जो कुछ हुआ, उसने पूरी दुनिया के सामने भारतीय लोकतंत्र की एक फीकी तस्वीर पेश की है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मंच से बेहद तीखे और सीधे शब्दों में वह कह दिया जिसे सुनकर सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर गया। उन्होंने साफ़ तौर पर प्रशासन की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर क्यों कार्यक्रम स्थल को अंतिम समय में बदला गया और क्यों आम लोगों को राष्ट्रपति से मिलने से रोकने की कोशिश की गई? क्या बंगाल का प्रशासन अब इतना बेलगाम हो गया है कि वह राष्ट्रपति के कार्यक्रम को भी अपनी मर्जी से ‘हाईजैक’ करने की कोशिश करेगा?


प्रोटोकॉल का गला घोंटती सियासत: अगवानी में एक मंत्री तक नहीं

जब कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी भारत आता है, तो प्रोटोकॉल के तहत उनका भव्य स्वागत होता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जब देश की अपनी राष्ट्रपति बंगाल की धरती पर कदम रखती हैं, तो न तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वहां मौजूद होती हैं और न ही उनके कैबिनेट का कोई वरिष्ठ मंत्री। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस बेरुखी को केवल महसूस नहीं किया, बल्कि सार्वजनिक रूप से इस पर अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई। उन्होंने ममता बनर्जी का जिक्र करते हुए जिस तरह ‘नाराजगी’ की बात कही, वह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की कार्यशैली पर एक कटाक्ष था।

क्या ममता बनर्जी इतनी व्यस्त थीं कि वह देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के सम्मान में चंद मिनट भी नहीं निकाल सकीं? या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति थी ताकि राष्ट्रपति के इस दौरे को फीका दिखाया जा सके? राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपनी टिप्पणी से यह स्पष्ट कर दिया कि वह इन चालबाजियों को बखूबी समझ रही हैं। उन्होंने मंच से हुंकार भरते हुए कहा कि प्रशासन भले ही बाधाएं खड़ी करे, लेकिन वह अपनी जनता से जुड़ने का रास्ता ढूंढ ही लेंगी।

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उन्नाव के बीघापुर क्षेत्र से 13 वर्षीय दीपेंद्र पटेल (शुभ) लापता है। आपकी एक शेयरिंग इस बच्चे को उसके माता-पिता से मिला सकती है।

बालक का विवरण:
नाम: दीपेंद्र पटेल (शुभ)
उम्र: 13 वर्ष
कद: लगभग 5 फीट
पहचान: स्कूल ड्रेस में है, साथ में B.S.A साइकिल है।
अंतिम बार देखा गया: लक्ष्मी नारायण पब्लिक स्कूल, बीघापुर (उन्नाव) से दोपहर 2:40 बजे (दिनांक: 07-03-2026) निकलते हुए।
पता: ग्राम शिवदीन खेड़ा, उन्नाव (U.P.)
यदि आपको यह बालक कहीं भी दिखे या कोई जानकारी मिले, तो तुरंत इन नंबरों पर संपर्क करें:
👉 पिता (योगेन्द्र सिंह पटेल): 9450494807
👉 या नजदीकी पुलिस स्टेशन (UP 112) को सूचित करें।

खाली मैदान और प्रशासन की साजिश: आखिर डर किसका है?

सच्ची पत्रकारिता का धर्म है कि हम उन तथ्यों को सामने रखें जो दबाए जा रहे हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने खुद इस बात का खुलासा किया कि बिधाननगर के बड़े मैदान के बजाय छोटे गोसाईंपुर मैदान में कार्यक्रम शिफ्ट करना एक प्रशासनिक चाल थी। मकसद साफ था—भीड़ को कम करना और राष्ट्रपति के प्रभाव को सीमित करना। राष्ट्रपति ने तीखे अंदाज में पूछा कि क्या प्रशासन यह चाहता था कि मैं यहाँ आऊं और सिर्फ खाली मैदान देखकर चली जाऊं?

यह सवाल किसी राजनेता का नहीं, बल्कि देश के अभिभावक का है। जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु यह कहती हैं कि “मैं भी बंगाल की बेटी हूं”, तो वह ममता बनर्जी के उस ‘बेटी’ वाले कार्ड को पूरी तरह ध्वस्त कर देती हैं जिसके दम पर तृणमूल कांग्रेस सालों से राजनीति कर रही है। राष्ट्रपति ने याद दिलाया कि बंगाल की संस्कृति सबका सम्मान करना सिखाती है, तिरस्कार करना नहीं।

आदिवासी अस्मिता पर चोट या राजनीतिक हताशा?

इस पूरे विवाद के केंद्र में आदिवासी समाज है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संथाल सम्मेलन में पहुँचना ममता सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। बंगाल में आदिवासी वोट बैंक की अहमियत किसी से छिपी नहीं है, और राष्ट्रपति का उनके बीच जाना टीएमसी को अपने सियासी आधार के लिए खतरा लग रहा है। शायद यही वजह है कि राज्य सरकार ने इस दौरे को वह सम्मान नहीं दिया जिसका हकदार राष्ट्रपति पद है।

मुख्यमंत्री की इस बेरुखी ने यह संदेश दिया है कि उनके लिए दलगत राजनीति और चुनावी गणित, संवैधानिक गरिमा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जिस तरह ममता बनर्जी को ‘छोटी बहन’ कहकर संबोधित किया, वह उनके बड़प्पन को दर्शाता है, लेकिन जवाब में ममता बनर्जी का गायब रहना उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता की ओर इशारा करता है। यह विवाद केवल एक दौरे का नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि बंगाल में सत्ता का नशा इस कदर हावी है कि वहां अब देश के राष्ट्रपति का स्वागत करना भी ‘राजनीति’ का हिस्सा मान लिया गया है।

आने वाले समय में यह सवाल बार-बार पूछा जाएगा कि क्या बंगाल की मुख्यमंत्री ने जानबूझकर राष्ट्रपति का अपमान किया? और अगर ऐसा है, तो यह भारतीय संघीय ढांचे के लिए एक बेहद चिंताजनक संकेत है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपनी शालीनता के साथ जो लकीर खींची है, उसे मिटाना अब ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं होगा।

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