
सोमनाथ (गुजरात) | नई दिल्ली ब्यूरो।
गुजरात के प्राचीन सोमनाथ तीर्थ में आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भावनाओं से ओतप्रोत, प्रेरणादायी और ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होंने सोमनाथ मंदिर के हजार वर्षों के संघर्ष, बलिदान और पुनर्निर्माण की यात्रा को भारत की सनातन चेतना की अमर शक्ति से जोड़ते हुए कहा कि सोमनाथ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्र के स्वाभिमान, अस्मिता और आत्मा का प्रतीक है।
प्रधानमंत्री ने “जय सोमनाथ” के उद्घोष के साथ अपने संबोधन की शुरुआत की और कहा कि यह पर्व अपने आप में दिव्यता और गौरव का अद्भुत संगम है। महादेव की उपस्थिति, समुद्र की लहरें, सूर्य की आभा, मंत्रोच्चार और असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था ने इस आयोजन को अलौकिक बना दिया। उन्होंने सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में इस आयोजन से जुड़ने को अपना सौभाग्य बताया।
मंत्रोच्चार, ड्रोन शो और शौर्य यात्रा की भव्यता
प्रधानमंत्री ने कहा कि 72 घंटे तक चला निरंतर ओंकार नाद और मंत्रोच्चार, हजार ड्रोन के माध्यम से सोमनाथ के हजार साल के इतिहास का सजीव चित्रण और 108 अश्वों के साथ निकली शौर्य यात्रा—ये सभी दृश्य गर्व, अध्यात्म और राष्ट्रीय गौरव से परिपूर्ण थे।
अडिग आस्था का प्रतीक सोमनाथ
इतिहास की ओर संकेत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सन 1026 में आक्रमण के समय आक्रांताओं ने भले ही भारत की आस्था को झुकाने का भ्रम पाला हो, लेकिन आज भी सोमनाथ पर फहराती धर्मध्वजा यह संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति अजेय है। प्रभास पाटन की धरती शौर्य और बलिदान की साक्षी रही है, जहां अनगिनत वीरों और शिवभक्तों ने मंदिर की रक्षा और पुनर्निर्माण के लिए अपने प्राण अर्पित किए।
सोमनाथ और भारत—एक समान संघर्ष
प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व केवल विध्वंस की स्मृति नहीं, बल्कि हजार वर्षों की सतत संघर्ष यात्रा का प्रतीक है। जैसे सोमनाथ को बार-बार नष्ट करने का प्रयास हुआ, वैसे ही भारत को भी मिटाने की कोशिशें की गईं, लेकिन न सोमनाथ टूटा, न भारत—क्योंकि राष्ट्र और आस्था एक-दूसरे से अभिन्न हैं।
उन्होंने इतिहास के विभिन्न दौरों का उल्लेख करते हुए बताया कि गजनी से लेकर अलाउद्दीन खिलजी, मुजफ्फर खान, महमूद बेगड़ा और औरंगजेब तक अनेक आक्रमण हुए, पर हर बार पुनर्निर्माण हुआ। अहिल्याबाई होल्कर और राजा कुमारपाल जैसे शासकों व भक्तों ने सोमनाथ को पुनर्जीवित किया। यह इतिहास पराजय का नहीं, बल्कि धैर्य, विजय और पुनरुत्थान का है।
पूर्वजों के पराक्रम का स्मरण
प्रधानमंत्री ने कहा कि क्या कोई समाज अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान को भुला सकता है? सोमनाथ का इतिहास सिखाता है कि सनातन आस्था को हिंसा के बल पर नष्ट नहीं किया जा सकता।
गुलामी की मानसिकता और इतिहास का विकृतिकरण
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी कुछ लोगों ने गुलामी की मानसिकता के कारण भारत की गौरवशाली विरासत से दूरी बनाई। सोमनाथ जैसे तीर्थों के इतिहास को विकृत कर आक्रमणों को केवल ‘लूट’ बताने का प्रयास हुआ, जबकि वास्तविक उद्देश्य आस्था का दमन था।
सरदार पटेल का संकल्प
प्रधानमंत्री ने सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प का स्मरण करते हुए कहा कि आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय भी विरोध के बावजूद लिया गया। 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति पर भी आपत्तियां हुईं, लेकिन राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा गया।
विरासत से विकास की राह
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का भारत विरासत से प्रेरणा लेकर विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सोमनाथ क्षेत्र में सांस्कृतिक विस्तार, संस्कृत विश्वविद्यालय, माधवपुर मेला, गिर लायन संरक्षण, केशोद एयरपोर्ट विस्तार और अहमदाबाद–वेरावल वंदे भारत ट्रेन जैसे प्रयास आस्था और प्रगति को एक साथ जोड़ते हैं।
विकसित भारत का संकल्प
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय व्यक्त “हजार साल के स्वप्न” को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आज सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर में है। 140 करोड़ नागरिकों के संकल्प से देश गरीबी के खिलाफ विजय पाएगा, वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी बनेगा और नई ऊंचाइयों को छुएगा।
मानवता का संदेश
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सभ्यता विनाश नहीं, बल्कि संतुलन, सृजन और मानवता की रही है। सोमनाथ हमें सिखाता है कि सृजन का मार्ग भले ही लंबा हो, पर वही स्थायी होता है। उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि विरासत से जुड़ते हुए आधुनिकता के साथ विकसित भारत के लक्ष्य की ओर एकजुट होकर आगे बढ़ें और “हर हर महादेव” व “जय सोमनाथ” के उद्घोष के साथ शुभकामनाएं दीं।
डिस्क्लेमर: प्रधानमंत्री के भाषण के कुछ अंश गुजराती भाषा में थे, जिनका यहाँ भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है।





