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लखनऊ में उपमुख्यमंत्री का बयान, कोर्ट के आदेश का पालन करेगी सरकार

राजधानी लखनऊ में गुरुवार को उच्च शिक्षा से जुड़े नए विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने स्पष्ट कहा कि यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए इक्विटी रेगुलेशन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक पर किसी तरह की टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है और सरकार अदालत के आदेश का पालन करेगी।

पत्रकारों से बातचीत में मौर्य ने कहा कि जब देश की सर्वोच्च अदालत ने किसी आदेश पर रोक लगा दी है, तो उस पर सार्वजनिक टिप्पणी करना उचित नहीं है। उन्होंने दोहराया कि सरकार न्यायालय के फैसले का सम्मान करती है और आगे की प्रक्रिया अदालत के निर्देशों के अनुरूप ही आगे बढ़ेगी।

उनके बयान के बाद शिक्षा क्षेत्र में जारी बहस एक बार फिर तेज हो गई है, क्योंकि नए नियमों को लेकर देशभर में छात्र संगठनों और शिक्षण संस्थानों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

इस मुद्दे ने विश्वविद्यालय परिसरों में समानता, आरक्षण और संस्थानों की स्वायत्तता को लेकर नई चर्चा को जन्म दिया है।


सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई नए UGC नियमों पर रोक

इस पूरे विवाद का केंद्र सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश है, जिसमें अदालत ने नए नियमों के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाते हुए फिलहाल पुराने नियमों को लागू रखने का निर्देश दिया है।

दरअसल, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा जारी “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा” संबंधी नए रेगुलेशन 2026 को लेकर कई याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि नियमों की कुछ परिभाषाएं अस्पष्ट हैं और उनका दुरुपयोग हो सकता है।

कोर्ट ने विशेष रूप से उस प्रावधान पर सवाल उठाया, जिसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता बताई गई। अदालत का कहना था कि यदि नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं होगी, तो शिकायतों के निपटारे में विवाद और भ्रम पैदा हो सकता है।

नए नियमों को इस साल जनवरी में अधिसूचित किया गया था। इनमें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों की शिकायतों के लिए विशेष समितियां और हेल्पलाइन स्थापित करने का निर्देश दिया गया था।

लेकिन कई संस्थानों और छात्रों ने कहा कि नियमों के कुछ हिस्से संतुलन नहीं बना पा रहे और इससे नए विवाद खड़े हो सकते हैं।


राजनीतिक दलों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं

नियमों पर रोक लगने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। कांग्रेस नेता टी. एस. सिंह देव ने कहा कि समाज के कई वर्गों को दशकों से भेदभाव का सामना करना पड़ा है, इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और नियमों को सावधानी से लागू किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि पुराने नियमों में झूठी शिकायत दर्ज करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान था, जिसे नए नियमों में हटा दिया गया है। उनके अनुसार, यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है, जिस पर दोबारा विचार होना चाहिए।

दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के सांसद मलविंदर सिंह कंग ने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता और मेरिट को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनका मानना है कि अत्यधिक नियमन से संस्थानों के स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इन बयानों से स्पष्ट है कि मुद्दा केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।


छात्रों और संस्थानों की चिंताएं, आगे क्या हो सकता है

नए नियमों को लेकर विश्वविद्यालय परिसरों में अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। कई छात्र संगठनों का कहना है कि भेदभाव रोकने के लिए मजबूत तंत्र जरूरी है, लेकिन यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी भी वर्ग के खिलाफ झूठे आरोपों का दुरुपयोग न हो।

कुछ छात्रों ने यह भी कहा कि शिकायतों की जांच के लिए पारदर्शी और संतुलित प्रणाली आवश्यक है, ताकि किसी भी छात्र के साथ अन्याय न हो। कई शिक्षण संस्थान भी चाहते हैं कि नियम स्पष्ट और व्यावहारिक हों ताकि प्रशासनिक स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा न हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत द्वारा नियमों पर रोक लगाए जाने के बाद अब सरकार और नियामक संस्था को नियमों की भाषा और प्रक्रिया पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। संभव है कि भविष्य में संशोधित नियम पेश किए जाएं, जिनमें सभी पक्षों की चिंताओं को संतुलित करने का प्रयास किया जाए।

फिलहाल, पुराने नियम लागू रहेंगे और अदालत में मामले की सुनवाई जारी रहेगी। शिक्षा जगत की नजर अब इस पर टिकी है कि आगे क्या बदलाव किए जाते हैं और किस तरह से छात्रों की सुरक्षा और संस्थानों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाया जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और न्याय का सवाल आने वाले समय में भी राष्ट्रीय बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।

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