कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखों के एलान के चंद घंटों के भीतर ही राज्य की सियासत में बड़ा ‘प्रशासनिक भूकंप’ आया है। चुनाव आयोग (ECI) ने निष्पक्ष चुनाव का हवाला देते हुए राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) समेत कई शीर्ष अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया है। इस फैसले ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) और केंद्र सरकार के बीच एक नए संवैधानिक टकराव को जन्म दे दिया है।
ECI का बड़ा एक्शन: कौन गया और कौन आया?
चुनाव आयोग ने 15 मार्च की रात को एक कड़ा निर्देश जारी कर राज्य प्रशासन के सबसे ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों को बदल दिया। आयोग का कहना है कि यह कदम चुनाव की तैयारी और निष्पक्षता की समीक्षा के बाद उठाया गया है।
मुख्य सचिव: नंदिनी चक्रवर्ती को पद से हटाकर दुष्यंत नारियाला (1993 बैच IAS) को नया मुख्य सचिव नियुक्त किया गया है।
पुलिस महानिदेशक (DGP): पीयूष पांडेय की जगह सिद्धार्थ नाथ गुप्ता (1992 बैच IPS) को बंगाल पुलिस की कमान सौंपी गई है।
गृह सचिव: जगदीश प्रसाद मीणा को हटाकर संघमित्रा घोष को गृह एवं पर्वतीय मामलों का नया प्रधान सचिव बनाया गया है।
कोलकाता पुलिस कमिश्नर: सुप्रतिम सरकार की जगह अजय कुमार नंद को शहर का नया पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया है।
आयोग ने सख्त हिदायत दी है कि हटाए गए अधिकारियों को चुनाव संपन्न होने तक किसी भी ‘चुनावी जिम्मेदारी’ में शामिल नहीं किया जाएगा।
TMC का राज्यसभा से वॉकआउट: “लोकतंत्र की हत्या”
इस फैसले के विरोध में सोमवार को राज्यसभा में भारी हंगामा हुआ। टीएमसी सांसदों ने शून्यकाल के दौरान इस मुद्दे को उठाते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग बीजेपी के ‘विस्तारित हाथ’ (Extended Arm) के रूप में काम कर रहा है।
टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने कहा कि जिस तरह से चुनी हुई सरकार के शीर्ष अधिकारियों को बिना किसी ठोस कारण के हटाया गया है, वह संघीय ढांचे पर हमला है। विरोध स्वरूप टीएमसी के सभी सांसदों ने राज्यसभा से वॉकआउट कर दिया।
ममता बनर्जी का ‘सत्याग्रह’ और बीजेपी का पलटवार
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस फैसले को ‘दिल्ली की साजिश’ करार दिया है। कोलकाता के एस्प्लेनेड में धरने पर बैठीं ममता ने कहा, “चुनाव आयोग सुपर-गॉड बनने की कोशिश न करे। अधिकारियों को डराना-धमकाना लोकतंत्र के लिए घातक है।” उन्होंने एलान किया है कि वह इस ‘प्रशासनिक तानाशाही’ के खिलाफ बड़े पैमाने पर सड़क पर उतरेंगी।
दूसरी ओर, बीजेपी ने इस कदम का पुरजोर समर्थन किया है। प्रदेश बीजेपी नेताओं का कहना है कि बंगाल में हिंसा मुक्त चुनाव के लिए इन अधिकारियों का हटना जरूरी था, क्योंकि इन पर सत्ताधारी दल के पक्ष में काम करने के आरोप लगते रहे हैं।
60 लाख वोटर्स पर विवाद: तनाव का एक और मोर्चा
प्रशासनिक फेरबदल के अलावा, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत करीब 60 लाख मतदाताओं के नाम ‘अधिनिर्णय’ (Adjudication) सूची में डालने को लेकर भी घमासान जारी है। ममता बनर्जी का आरोप है कि बीजेपी के इशारे पर उनके समर्थकों के नाम काटे जा रहे हैं, जबकि आयोग इसे चुनावी प्रक्रिया को शुद्ध करने का हिस्सा बता रहा है।
2026 की राह में कांटों की बिसात
बंगाल चुनाव अब केवल दो पार्टियों की जंग नहीं, बल्कि राज्य बनाम केंद्र और राज्य बनाम चुनाव आयोग की लड़ाई बनता जा रहा है। 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले अधिकारियों का यह तबादला चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
