प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन | आचार्य विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी की 500वीं पुस्तक का विमोचन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज वीडियो संदेश के माध्यम से आचार्य श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी महाराज की 500वीं पुस्तक के विमोचन समारोह को संबोधित किया। इस पावन अवसर पर प्रधानमंत्री ने सबसे पहले पूज्य भुवनभानुसूरीश्वर जी महाराज के चरणों में नमन किया और प्रसांतमूर्ति सुविशाल गच्छाधिपति पूज्य श्रीमद विजय राजेंद्रसूरीश्वर जी महाराज, पूज्य गच्छाधिपति श्री कल्पतरुसूरीश्वर जी महाराज, सरस्वती कृपापात्र परम पूज्य आचार्य श्रीमद विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी महाराज सहित उपस्थित सभी साधु-साध्वियों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। उन्होंने ऊर्जा महोत्सव समिति के सभी सदस्यों को इस आयोजन के लिए बधाई और शुभकामनाएं दीं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह अवसर केवल एक पुस्तक विमोचन का नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और मानवता के संदेश से जुड़ने का है। आचार्य विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी महाराज ने ज्ञान को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने जीवन के आचरण में उतारकर समाज के सामने प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि महाराज का व्यक्तित्व संयम, सरलता और स्पष्टता का अद्भुत उदाहरण है। जब वे लिखते हैं, तो उनके शब्द अनुभव और आत्मबोध से भरपूर होते हैं, जब वे बोलते हैं, तो वाणी करुणा से ओतप्रोत होती है और जब वे मौन रहते हैं, तब भी उनका मौन मार्गदर्शन करता है।
PM @narendramodi‘s message during the release of Shrimad Vijayaratna Sunder Surishwarji Maharaj’s 500th book. https://t.co/5QrcO8oGc6
— PMO India (@PMOIndia) January 11, 2026
प्रधानमंत्री मोदी ने महाराज की 500वीं पुस्तक “प्रेमनु विश्व, विश्वनो प्रेम” के विषय की विशेष सराहना करते हुए कहा कि यह शीर्षक स्वयं ही प्रेम और मानवीय एकता का संदेश देता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह रचना समाज, युवाओं और समूची मानवता को सकारात्मक दिशा प्रदान करेगी तथा ऊर्जा महोत्सव के माध्यम से जन-जन में नई वैचारिक चेतना का संचार होगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि महाराज द्वारा रचित 500 ग्रंथ विचारों का ऐसा विशाल भंडार हैं, जिनमें मानव जीवन की चुनौतियों के आध्यात्मिक और व्यावहारिक समाधान निहित हैं। समय और परिस्थितियों के अनुसार ये ग्रंथ समाज के लिए पथप्रदर्शक सिद्ध होंगे। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों और पूर्व आचार्यों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत जैसे सिद्धांत इन रचनाओं में प्रेम, सहिष्णुता और सद्भाव के साथ आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत हुए हैं।
प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से कहा कि आज जब विश्व विभाजन, तनाव और संघर्ष के दौर से गुजर रहा है, तब “प्रेमनु विश्व, विश्वनो प्रेम” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक मंत्र बनकर सामने आती है। यह प्रेम की शक्ति को पहचानने और शांति व सौहार्द के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है, जिसकी आज पूरी दुनिया को आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने जैन दर्शन के मूल सिद्धांत “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका अर्थ है—हर जीवन एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। जब इस भावना को आत्मसात किया जाता है, तो सोच व्यक्ति से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र और मानवता के व्यापक हित की ओर अग्रसर होती है।
उन्होंने नवकार मंत्र दिवस का स्मरण करते हुए बताया कि उस ऐतिहासिक अवसर पर चारों संप्रदाय एक साथ आए थे और उन्होंने नौ संकल्प लिए थे—जल संरक्षण, “एक पेड़ मां के नाम”, स्वच्छता अभियान, स्थानीय उत्पादों का उपयोग, भारत दर्शन, प्राकृतिक खेती, स्वस्थ जीवनशैली, योग और खेलों को अपनाना तथा गरीबों की सहायता करना। प्रधानमंत्री ने आज एक बार फिर इन संकल्पों को दोहराया और उन्हें जीवन में उतारने का आह्वान किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है और यह युवा शक्ति एक विकसित भारत के निर्माण के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी सशक्त बना रही है। इस परिवर्तन यात्रा में संतों का मार्गदर्शन, उनका साहित्य और उनके विचार अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने आचार्य विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी महाराज को उनकी 500वीं पुस्तक के लिए पुनः शुभकामनाएं दीं और विश्वास व्यक्त किया कि उनके विचार भारत की बौद्धिक, नैतिक और मानवीय यात्रा को आने वाले समय में भी प्रकाशमान करते रहेंगे।





