उन्नाव में ‘ढाबों’ पर पक रही मिलीभगत! शुद्ध शाकाहारी के नाम पर अंडा-बिरयानी, फूड विभाग मौन क्यों?

सूर्या शुक्ला | विशेष संवाददाता
उन्नाव। कानपुर–लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर चल रहे दर्जनों चर्चित ढाबों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जिस मुद्दे पर फूड डिपार्टमेंट को सख्ती दिखानी चाहिए थी, वहां विभाग की भूमिका लगातार संदेह के घेरे में बनी हुई है। शुद्ध शाकाहारी लिखे गए ढाबों पर खुलेआम अंडा, बिरयानी और मांसाहारी भोजन परोसे जाने की शिकायतें लंबे समय से मिल रही हैं, लेकिन अब तक न तो कोई ठोस जांच हुई और न ही कार्रवाई।
स्थानीय लोगों और हाईवे से गुजरने वाले यात्रियों के अनुसार, इन ढाबों पर जो बोर्ड पर लिखा होता है, वह रसोई में नहीं मिलता और जो परोसा जाता है, उसका कहीं उल्लेख नहीं। लोगों का कहना है कि यह केवल उपभोक्ताओं के साथ धोखा नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था के साथ खुला खिलवाड़ है। इसके बावजूद फूड डिपार्टमेंट की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
सूत्रों की मानें तो जब भी किसी ढाबे की शिकायत ऊपर तक पहुंचती है, मामला जांच तक पहुंचने से पहले ही दबा दिया जाता है। बताया जाता है कि कुछ ढाबा संचालकों को स्थानीय प्रभावशाली नेताओं का संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते विभागीय अधिकारी कार्रवाई से बचते नजर आते हैं। यदि कोई आवाज उठाता है, तो उस आवाज को भी कथित तौर पर राजनीतिक दबाव में शांत करा दिया जाता है।
करीब एक वर्ष से अधिक समय से यह पूरा खेल खुलेआम चल रहा है। सूत्र बताते हैं कि फूड सेफ्टी, लाइसेंस और गुणवत्ता मानकों की जांच केवल कागजों तक सीमित रह गई है, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय आंख मूंदे बैठे हैं।
मामला केवल भोजन तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवैध रूप से खड़े ढाबे यातायात व्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरा बन चुके हैं। प्रशासन की ओर से कई बार चेतावनी दी गई कि ढाबों के बाहर अव्यवस्थित पार्किंग और बड़े-बड़े बोर्डों से सड़क पर जाम की स्थिति बनती है, लेकिन इन निर्देशों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। नतीजतन, इस मार्ग पर दुर्घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
सूत्रों का यह भी दावा है कि कुछ ढाबा संचालकों को उन्नाव सदर से विधायक पंकज गुप्ता का कथित राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। इसी वजह से न तो शासन स्तर पर सवाल उठते हैं और न ही प्रशासनिक अधिकारी सख्त कदम उठाने का साहस दिखा पा रहे हैं। हालांकि, ये दावे स्थानीय सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित हैं।
अब सवाल यह है कि क्या फूड डिपार्टमेंट और प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतजार कर रहे हैं? क्या आम जनता के स्वास्थ्य, आस्था और सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर यूं ही पर्दा पड़ा रहेगा?






