
नई दिल्ली। वैश्विक व्यापार, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच समुद्र की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। समुद्री मार्गों से होने वाला व्यापार अब केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्थिरता और विकास से भी जुड़ गया है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में सागरमंथन के चार तकनीकी सत्रों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुरक्षा, समुद्री विरासत, बंदरगाह शहरों के सतत विकास और महासागर आधारित अर्थव्यवस्था के लिए वित्तपोषण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा केंद्रित है।
इन सत्रों का साझा उद्देश्य समुद्री संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, मजबूत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, समावेशी आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने के उपायों पर विचार करना है।
सागरमंथन के पहले तकनीकी सत्र ‘नई कमोडिटी सिक्योरिटी: भोजन, ईंधन और उर्वरक’ में उन आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुरक्षा पर ध्यान दिया गया है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।अनाज, ऊर्जा संसाधन और उर्वरक अब केवल व्यापारिक उत्पाद नहीं रह गए हैं। इनकी उपलब्धता सीधे खाद्य सुरक्षा, औद्योगिक उत्पादन, महंगाई और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है। भू-राजनीतिक तनाव, निर्यात प्रतिबंध, जलवायु संबंधी जोखिम और समुद्री मार्गों में व्यवधान इन वस्तुओं की आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं। विशेष रूप से आयात पर निर्भर देशों के लिए आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट का असर खाद्य पदार्थों की कीमतों, ऊर्जा की उपलब्धता और कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है।
इस सत्र में प्रमुख रूप से तीन रणनीतिक उपायों पर विचार किया गया है –
रणनीतिक भंडार : संकट के समय आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त भंडारण क्षमता विकसित करना।
आपूर्तिकर्ताओं में विविधता: कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भरता कम करके वैकल्पिक स्रोत विकसित करना।
समुद्री संपर्क और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती : महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा तथा बंदरगाहों और परिवहन नेटवर्क की विश्वसनीयता बढ़ाना।
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO), अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका पर भी ध्यान दिया गया है। इन संस्थाओं के सहयोग से समुद्री परिवहन की सुरक्षा, श्रमिकों की स्थिति और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की निरंतरता को बेहतर बनाने के उपाय तलाशे जा सकते हैं।
दूसरा तकनीकी सत्र ‘यादें, म्यूजियम और मतलब: समुद्र के टिकाऊ भविष्य के लिए हमारे समुद्री अतीत की अहमियत’ समुद्री इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और तटीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान की भूमिका पर केंद्रित है। यह सत्र जर्मन मैरीटाइम म्यूजियम के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। समुद्री अर्थव्यवस्था और ब्लू इकोनॉमी से जुड़ी नीतियों में आमतौर पर वैज्ञानिक शोध, आर्थिक विकास और तकनीकी नवाचार पर जोर दिया जाता है। हालांकि, समुद्र से जुड़े समुदायों के ऐतिहासिक अनुभव और पारंपरिक ज्ञान भी वर्तमान चुनौतियों का समाधान खोजने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
सदियों से समुद्र पर निर्भर समुदायों ने बदलते मौसम, प्राकृतिक आपदाओं, व्यापारिक परिस्थितियों और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच अपनी आजीविका बनाए रखने के तरीके विकसित किए हैं। इन अनुभवों से तटीय विकास, समुद्री संसाधनों के प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए उपयोगी सीख मिल सकती है। इस चर्चा में संग्रहालयों, अभिलेखागार, शोध संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण माना गया है। इन संस्थानों के माध्यम से ऐतिहासिक जानकारी को संरक्षित करने के साथ-साथ उसे आधुनिक नीति निर्माण और विकास योजनाओं से जोड़ा जा सकता है।
इसका व्यापक उद्देश्य समुद्री विरासत को केवल अतीत की स्मृति तक सीमित न रखते हुए सतत विकास, सामुदायिक भागीदारी और बेहतर निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाना है।
तीसरा तकनीकी सत्र ‘अगली ब्लू कैपिटल्स: टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्थाओं के केंद्र में बंदरगाह शहर’ तटीय शहरों और बंदरगाह क्षेत्रों की बढ़ती आर्थिक भूमिका पर केंद्रित है। बंदरगाह शहर वैश्विक व्यापार, समुद्री उद्योग, परिवहन, नवाचार और स्थानीय आजीविका के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी तट से 100 किलोमीटर के दायरे में रहती है। ऐसे में तटीय क्षेत्रों का नियोजित विकास आर्थिक अवसरों के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और जलवायु अनुकूलन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
हालांकि, बंदरगाहों के विस्तार और समुद्री गतिविधियों में वृद्धि से कई चुनौतियां भी सामने आती हैं। इनमें बुनियादी ढांचे पर बढ़ता दबाव, समुद्र के बढ़ते स्तर से जुड़े जोखिम, प्रदूषण, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका शामिल हैं।
इस सत्र में बंदरगाह प्राधिकरणों, नगर निकायों, उद्योगों और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने पर जोर दिया गया है। विशेष रूप से उभरते बंदरगाह शहरों के लिए ऐसी विकास रणनीतियां महत्वपूर्ण हैं, जो आर्थिक विस्तार को पर्यावरणीय स्थिरता और समावेशी शहरी विकास के साथ जोड़ सकें। भविष्य के समुद्री शहरों को केवल व्यापारिक केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे टिकाऊ आर्थिक केंद्रों के रूप में विकसित करना होगा, जहां रोजगार, नवाचार, बेहतर बुनियादी ढांचा और सामुदायिक कल्याण साथ-साथ आगे बढ़ें।
चौथा तकनीकी सत्र ‘ब्लू-ग्रीन बदलाव के लिए फाइनेंसिंग: महासागर निवेश का नया ढांचा तैयार करना’ टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्था के विकास के लिए पूंजी जुटाने की चुनौतियों और नए वित्तीय विकल्पों पर केंद्रित है। कम कार्बन उत्सर्जन वाली, पर्यावरण के अनुकूल और समावेशी ब्लू इकोनॉमी के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है। ग्रीन शिपिंग, स्वच्छ ईंधन, जहाजों के आधुनिकीकरण, टिकाऊ बंदरगाहों, समुद्री नवीकरणीय ऊर्जा, टिकाऊ मत्स्य पालन और जलीय कृषि जैसे क्षेत्रों में वित्तपोषण की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इसके बावजूद, शुरुआती लागत अधिक होने, निवेश पर रिटर्न को लेकर अनिश्चितता, तकनीकी चुनौतियों और सीमित परियोजना उपलब्धता के कारण कई समुद्री परियोजनाओं को पर्याप्त पूंजी नहीं मिल पाती। ग्लोबल साउथ के देशों के लिए यह चुनौती और महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां विकास की जरूरतें बड़ी हैं और वित्तीय संसाधन सीमित हो सकते हैं।
इस सत्र में निवेश बढ़ाने के लिए कई वित्तीय विकल्पों पर विचार किया गया है: ब्लेंडेड फाइनेंस – सार्वजनिक और निजी पूंजी को मिलाकर निवेश जोखिम कम करना। ब्लू और ग्रीन बॉन्ड – टिकाऊ समुद्री परियोजनाओं तथा पर्यावरण अनुकूल विकास के लिए पूंजी जुटाना। गारंटी और बीमा – निवेशकों के जोखिम को कम करके नई परियोजनाओं को वित्तपोषण के योग्य बनाना। विकास वित्त संस्थानों की भागीदारी – दीर्घकालिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना। नए जलवायु वित्त तंत्र – समुद्री परिवहन के कार्बन उत्सर्जन को कम करने और स्वच्छ तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना।
बहुपक्षीय विकास बैंक, निर्यात ऋण एजेंसियां, बीमा कंपनियां, निजी निवेशक और विकास वित्त संस्थान इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल निवेश बढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि समुद्री अर्थव्यवस्था के हरित बदलाव का लाभ तटीय समुदायों, श्रमिकों और विकासशील देशों तक पहुंचे।
इन चारों तकनीकी सत्रों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि समुद्री अर्थव्यवस्था का भविष्य कई परस्पर जुड़ी प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।
पहली प्राथमिकता आवश्यक वस्तुओं की सुरक्षित और भरोसेमंद आपूर्ति है। दूसरी, समुद्री इतिहास और स्थानीय ज्ञान को आधुनिक नीति निर्माण में शामिल करना है। तीसरी, बंदरगाह शहरों को आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए विकसित करना है। चौथी, टिकाऊ समुद्री परियोजनाओं के लिए पर्याप्त और सुलभ वित्तपोषण सुनिश्चित करना है।
इन सभी क्षेत्रों में सरकारों, निजी उद्योगों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, शोध संगठनों और तटीय समुदायों के बीच सहयोग आवश्यक है।
सागरमंथन के तकनीकी सत्र समुद्र को केवल व्यापार और परिवहन के माध्यम के रूप में देखने के बजाय उसे खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा स्थिरता, सांस्कृतिक विरासत, शहरी विकास और हरित अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार के रूप में समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
भविष्य की समुद्री रणनीति को सफल बनाने के लिए आपूर्ति श्रृंखलाओं की मजबूती, बंदरगाहों का सतत विकास, पारंपरिक ज्ञान का उपयोग और नवाचार आधारित वित्तपोषण एक साथ आगे बढ़ाने होंगे।
समुद्र की आर्थिक क्षमता का पूरा लाभ तभी संभव है, जब विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समावेशन और तटीय समुदायों की दीर्घकालिक समृद्धि को भी समान महत्व दिया जाए। यही दृष्टिकोण एक मजबूत, टिकाऊ और समावेशी ब्लू इकोनॉमी के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

