आसपास बनारस कर लूँ…!

बंदिशें तमाम आई…..

नौजवानी की दहलीज पर ही प्यारे

जानते हो तुम भी ….बेहद करीब से

फिर चाहते क्यों हो…..?

कि सुर-लय-ताल अपना….

मैं सबसे सरस कर लूँ….

जब आनन्द आता है उन्हें….!

पथरीली पगडण्डियों पर ही प्यारे…

फिर मुझे क्या पड़ी है बताओ….?

कि उनके लिए….मेहनत करके….

राह सारी मैं चौरस कर लूँ….

किसी कोने में….चेहरा छुपा के….

बैठे हैं जब लोग यहाँ के सारे…..

फिर आप ही बताओ प्यारे कि मैं..!

उनसे कैसे कोई बतरस कर लूँ….

गुरबत में ही जीना है….!

यहाँ जब मुझको प्यारे….फिर…

किस बात के लिए मैं…..

खुद को उनके परवश कर लूँ….

गहराईयाँ जो बक्शी हैं….!

विधाता ने समन्दर सी मुझको….

फिर अनायास ही क्यों……?

मैं खुद को पर्वत कर लूँ…

राह ढूँढ़नी है जब खुद ही….!

यहाँ जमाने में मुझको प्यारे….

फिर कदम-कदम पर….!

खुद को क्यों मैं विवश कर लूँ….

मन-मस्तिष्क दोनों ही….!

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कहते हैं अक्सर ही प्यारे…कि…

ढल जाओ ज़माने के संग तुम भी…

और अपनी बोली….!

अब थोड़ी सी कर्कश कर लो….

बुद्धि भी अपनी कुटिल होकर….!

कहती है अक्सर यही कि…

इस छछन्दी दुनिया में….!

अपना स्वभाव एकरस कर लो….

जब हर ओर मिल रहे हैं….!

सिरफिरे ही यहाँ पर….

फिर बेहतर यही है कि….!

जो मिले प्यार से यहाँ…

उनको अँकवार में भरकर अपने…!

अनायास ही…..आसपास अपने….

मैं बनारस कर लूँ…..!!

अनायास ही…..आसपास अपने….

मैं बनारस कर लूँ…..!!

 

रचनाकार….

जितेन्द्र कुमार दुबे

अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ

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