
अमरेश द्विवेदी, विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन से जुड़े अहम विधेयकों पर लंबी बहस के बाद शुक्रवार को वोटिंग हुई, लेकिन अपेक्षित बहुमत न मिलने के कारण संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पास नहीं हो सका। केंद्रीय मंत्री Arjun Ram Meghwal ने यह बिल सदन में पेश किया था, जिस पर करीब 21 घंटे तक चर्चा चली और 130 सांसदों ने अपने विचार रखे, जिनमें 56 महिला सांसद भी शामिल रहीं।
वोटिंग का गणित: क्यों नहीं पास हो पाया बिल
वोटिंग के दौरान कुल 489 वोट पड़े, जिनमें 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में और 230 ने विरोध में वोट दिया। हालांकि यह आंकड़ा बहुमत जैसा दिखता है, लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक 326 वोट नहीं मिल पाए, जिसके चलते यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
किन-किन विधेयकों पर हुई चर्चा
संसद में इस दौरान तीन प्रमुख विधेयकों पर विचार हुआ—
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव, जिसमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें शामिल हैं।
- परिसीमन संशोधन विधेयक, 2026: जनसंख्या के आधार को पुनर्परिभाषित कर 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव।
- केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक, 2026: दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर में संबंधित कानूनों में बदलाव, ताकि परिसीमन और आरक्षण लागू हो सके।
बहस में तीखे तेवर: सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष
बहस के दौरान सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi की भाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी भाषा सदन की मर्यादा के अनुरूप नहीं है और उन्हें वरिष्ठ नेताओं से संवाद की शैली सीखनी चाहिए।
वहीं राहुल गांधी ने इस विधेयक पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि इसका वास्तविक महिला सशक्तिकरण से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बिल महिलाओं के नाम पर देश के चुनावी नक्शे को बदलने की कोशिश है और इससे SC, ST तथा OBC वर्गों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
राजनीतिक असर: आगे क्या?
इस बिल के पास न होने से अब सरकार के सामने इसे दोबारा लाने या संशोधित करने की चुनौती होगी। वहीं विपक्ष इसे अपनी बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर सकता है। महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दे अब आने वाले समय में देश की राजनीति के केंद्र में बने रहने की संभावना है।




