
वह जो अजन्मा है, अविनाशी है,
हर पल, हर क्षण का साक्षी है।
उसे किसी ने देखा नहीं, किसी ने बाँधा नहीं,
वह तो ब्रह्मांड का आदि और अंत है।
अंबर की ऊँचाइयों को नापता है, महासागर की गहराइयों को मापता है।
वह हिमशिखरों की धवलता में है,
वह मरुस्थल की तपन और शीतलता में है।
न वह गुफ़ाओं में छिपा है, न पहाड़ों पर,
वह तो धड़क रहा है, हर प्राणी के साँसों पर।
बहती नदियों की कल-कल में है,
पवन की सरसराहट की हलचल में है।
न उसे मंदिर की घंटी बुला सकी, न मस्जिद की अज़ान उसे सुना सकी।
वह तो प्रेम के आँसुओं में बहता है,
और नफ़रत की आग को भी सहता है।
वह ज्ञान की हर पुस्तक में है,
वह अज्ञानी के मन के अँधेरे में भी है।
वह सृजन की पहली किरण में है,
और विनाश के तांडव की हर क्षण में है।
उसे सीमाओं में मत बाँधो, वह तो अनंत और असीम है।
जो घट-घट में समाया है, वही ‘सर्वव्यापी’ है।
उसे पहचानो, अनुभव करो,
कि वह तुम्हारे भीतर भी है, और बाहर भी।
