निपुण साहित्य
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अपना अरिहन्त कहूँ…..!
आदि कहूँ….अंत कहूँ….या फिर…अनंत कहूँ…देव कहूँ ….साधु कहूँ…या फिर….सिद्ध कोई संत कहूँ…पर्याय किसी और का….!भला क्यों कहूँ…?क्यों न सीधे-सीधे…..मैं तुम्हें….पार्वती…
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महापुरुष… बनाम… ग्रेट!
बदलते परिदृश्य में….! लोगबाग….गाँव-देश-समाज में… खुद को कहाने को “ग्रेट”… बना रहे हैं टाइम बाउंड “टारगेट”.. उनके शब्दकोश से गायब…
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आसपास बनारस कर लूँ…!
बंदिशें तमाम आई….. नौजवानी की दहलीज पर ही प्यारे जानते हो तुम भी ….बेहद करीब से फिर चाहते क्यों हो…..?…
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हर किसी को हमने! – जितेन्द्र कुमार दुबे, अपर पुलिस उपायुक्त, लखनऊ
दुनिया भर के लोगों ने, दिन के उजाले में…. उसका मुस्कुराता मुखड़ा देखा… किसी ने क्या समझा…क्या पाया… मालूम नहीं…
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