सागरमंथन 2026 का पहला दिन : वैश्विक समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी और ग्रीन शिपिंग पर नई दिल्ली में महामंथन
भारत के बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्रालय के संयुक्त आयोजन में समुद्री सुरक्षा, सप्लाई चेन की मजबूती, टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा केंद्रित रही।

नई दिल्ली: वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी में महासागरों की बढ़ती भूमिका के बीच ‘सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग 2026’ का तीसरा संस्करण 7 से 9 अक्टूबर तक नई दिल्ली में आयोजित किया गया। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) और भारत के बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्रालय के संयुक्त आयोजन में समुद्री सुरक्षा, सप्लाई चेन की मजबूती, टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा केंद्रित रही।
इस संवाद का मुख्य उद्देश्य बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी विकास से उत्पन्न समुद्री चुनौतियों को समझना तथा महासागरों को वैश्विक सहयोग, आर्थिक विकास और स्थिरता का माध्यम बनाने के उपायों पर विचार करना था। कार्यक्रम में नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, विद्वानों, नागरिक समाज, मीडिया और बहुपक्षीय संगठनों की भागीदारी निर्धारित की गई।
आज महासागर केवल देशों को जोड़ने वाले जलमार्ग नहीं हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा सुरक्षा के प्रमुख आधार बन चुके हैं। होर्मुज़ और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से लेकर आर्कटिक के उभरते रास्तों तक, समुद्री कनेक्टिविटी का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल और गैस की आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा तथा आवश्यक खनिजों की आवाजाही समुद्री परिवहन पर निर्भर करती है। ऐसे में समुद्री मार्गों पर किसी भी प्रकार की बाधा का असर वैश्विक बाजारों, माल ढुलाई की लागत और विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु संबंधी जोखिम, समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां और बदलती तकनीक इन मार्गों को अधिक संवेदनशील बना रही हैं। सागरमंथन 2026 का व्यापक उद्देश्य इन जोखिमों के बीच समुद्री प्रणालियों को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और लचीला बनाने के लिए सहयोग के नए रास्ते तलाशना रहा।
सागरमंथन 2026 की विषयवस्तु को पांच प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया गया।
- स्टेडी स्ट्रेट्स (Steady Straits): भू-राजनीतिक विभाजन और अस्थिरता के बीच समुद्री आवाजाही तथा व्यापार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- ब्लू ब्रेकथ्रूज (Blue Breakthroughs): जहाज निर्माण, स्वच्छ ईंधन और पर्यावरण-अनुकूल समुद्री परिवहन में नवाचार को बढ़ावा देना।
- कॉम्प्लेक्स सीज (Complex Seas): व्यापार, कनेक्टिविटी और वैश्विक उथल-पुथल से जुड़ी चुनौतियों का प्रबंधन करना।
- ओशन सोसाइटीज (Ocean Societies): समुद्र पर निर्भर समुदायों, संस्कृति, रोजगार और आजीविका के संरक्षण पर ध्यान देना।
- द हार्ट ऑफ द डील (The Heart of the Deal): बंदरगाहों को भीतरी क्षेत्रों से जोड़कर व्यापारिक नेटवर्क और आर्थिक विकास को मजबूत करना।
इन विषयों के माध्यम से समुद्री अर्थव्यवस्था को केवल व्यापार और बुनियादी ढांचे तक सीमित न रखकर पर्यावरण, समाज और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के व्यापक संदर्भ में देखने पर जोर दिया गया।
पहले दिन, 7 अक्टूबर को आयोजित ‘इंडो-पैसिफिक में भारत-कोरिया: समुद्री सहयोग और आर्थिक मजबूती’ शीर्षक गोलमेज चर्चा में जहाज निर्माण, शिपिंग, समुद्री लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक सहयोग से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। यह सत्र कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक पॉलिसी (KIEP) के साथ जुड़ा था।
इस चर्चा की रूपरेखा में अप्रैल 2026 के भारत-दक्षिण कोरिया शिखर सम्मेलन के बाद हुई प्रगति की समीक्षा तथा दोनों देशों की विशेष रणनीतिक साझेदारी को समुद्री क्षेत्र में आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया गया।
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच जहाज निर्माण इकोसिस्टम, बंदरगाह आधारित विकास, समुद्री तकनीक और सप्लाई चेन के एकीकरण में सहयोग की संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं। दक्षिण कोरिया का जहाज निर्माण अनुभव और भारत की बढ़ती समुद्री क्षमता इस साझेदारी को नई दिशा दे सकती है।
सत्र में सरकारी संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच बेहतर समन्वय, निवेश और औद्योगिक सहयोग की आवश्यकता पर विचार किया जाना था। इसका व्यापक लक्ष्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में व्यापार मार्गों की मजबूती, आर्थिक संबंधों में विविधता और समुद्री कनेक्टिविटी को प्रोत्साहित करना रहा।
सम्मेलन का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय OECD ब्लू इकोनॉमी स्कोरबोर्ड की भूमिका रहा। यह सत्र ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) से जुड़ा था।
ब्लू इकोनॉमी में मत्स्य पालन, समुद्री परिवहन, बंदरगाह, तटीय पर्यटन, समुद्री ऊर्जा और महासागरों से संबंधित अन्य आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं। हालांकि, इस क्षेत्र में विकास के साथ समुद्री पारिस्थितिकी की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के हितों को संतुलित रखना भी आवश्यक है।
इस संदर्भ में विश्वसनीय आंकड़ों और तुलनात्मक संकेतकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। OECD ब्लू इकोनॉमी स्कोरबोर्ड जैसे ढांचे आर्थिक प्रदर्शन के साथ पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासनिक पहलुओं का आकलन करने में मदद कर सकते हैं।
बेहतर मापन व्यवस्था से सरकारों को नीतिगत कमियों की पहचान करने, निवेश की प्राथमिकताएं तय करने और दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों के अनुरूप रणनीतियां तैयार करने में सहायता मिल सकती है। साझा संकेतकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से टिकाऊ तथा समावेशी समुद्री अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना इस चर्चा का प्रमुख उद्देश्य रहा।
‘अफ्रीका के ब्लू गेटवे: कॉरिडोर से कनेक्टिविटी के इंजन तक’ विषय ने वैश्विक व्यापार में अफ्रीका की रणनीतिक समुद्री स्थिति को रेखांकित किया।
रेड सी, गल्फ ऑफ अदन, अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर से जुड़े मार्ग अफ्रीकी देशों को वैश्विक बाजारों तथा संसाधन उत्पादक क्षेत्रों से जोड़ते हैं। लोबिटो कॉरिडोर जैसी पहल और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में निवेश से व्यापार मार्गों में विविधता लाने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
हालांकि, कमजोर बुनियादी ढांचा, समुद्री सुरक्षा संबंधी जोखिम, सीमित क्षेत्रीय एकीकरण और विभिन्न देशों की क्षमताओं में अंतर जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
इस विषय के तहत समुद्री कॉरिडोर को केवल माल परिवहन के रास्ते के रूप में नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास, निवेश, रोजगार और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के माध्यम के रूप में विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
‘भरोसे की लहरें: बंदरगाह, साझेदारी और एक नई समुद्री सदी का निर्माण’ सत्र में बंदरगाहों और समुद्री बुनियादी ढांचे की बदलती भूमिका पर विचार किया गया।
बंदरगाह अब केवल आयात और निर्यात के केंद्र नहीं हैं। वे ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा, लॉजिस्टिक्स और राष्ट्रीय आर्थिक रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से बन गए हैं। आधुनिक बंदरगाहों में निवेश, बेहतर परिवहन संपर्क और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी व्यापार की लागत घटाने तथा सप्लाई चेन को अधिक विश्वसनीय बनाने में मदद कर सकते हैं।
‘बड़ा बदलाव: व्यापार, शक्ति और अवसर’ शीर्षक फायरसाइड चैट में भी वैश्विक वाणिज्य, तकनीकी बदलाव और समुद्री कनेक्टिविटी के बीच संबंधों पर चर्चा की रूपरेखा रखी गई।
सागरमंथन 2026 का एक प्रमुख विषय भारत-यूरोपीय संघ ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर रहा। इस पहल का उद्देश्य भारत में हरित ईंधन उत्पादन की क्षमता और यूरोप की बढ़ती मांग के बीच संबंध मजबूत करना है।
ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल जैसे वैकल्पिक ईंधन समुद्री परिवहन में कार्बन उत्सर्जन कम करने के संभावित विकल्प हैं। वर्ष 2025 में शुरू हुए प्रारंभिक संभाव्यता अध्ययन और 2026 में प्रस्तावित उद्योग गठबंधन के संदर्भ में यह पहल अध्ययन से क्रियान्वयन की ओर बढ़ने पर केंद्रित रही।
इस क्षेत्र में सफलता के लिए हरित ईंधन उत्पादन, परिवहन, भंडारण, बंदरगाह सुविधाओं, वित्तपोषण और तकनीकी मानकों के बीच समन्वय जरूरी होगा। सरकार और उद्योग के सहयोग से व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य तथा बड़े स्तर पर संचालित किए जा सकने वाले ग्रीन शिपिंग नेटवर्क विकसित करने की संभावनाएं तलाशना इस सत्र का उद्देश्य था।
भारत का समुद्री भविष्य ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’, पीएम गति शक्ति और सागरमाला कार्यक्रम जैसे प्रयासों से जुड़ा है। इन पहलों का व्यापक लक्ष्य बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाना, लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाना, औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करना और भारत की समुद्री कनेक्टिविटी मजबूत करना है।
हिंद महासागर में भारत की भौगोलिक स्थिति और उसकी ऐतिहासिक समुद्री विरासत उसे क्षेत्रीय तथा वैश्विक समुद्री सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर देती है।
सागरमंथन के संदर्भ में भारत के समुद्री विजन का महत्व केवल घरेलू बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, टिकाऊ जहाजरानी, व्यापार मार्गों की सुरक्षा और साझा आर्थिक अवसरों को आगे बढ़ाने से भी जुड़ा है।
सागरमंथन 2026 का व्यापक संदेश यह है कि महासागरों की सुरक्षा और स्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य से सीधे जुड़ी हुई है। समुद्री मार्गों में व्यवधान, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए देशों, उद्योगों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच समन्वय आवश्यक है।
भारत-दक्षिण कोरिया समुद्री सहयोग, OECD ब्लू इकोनॉमी स्कोरबोर्ड, अफ्रीका के व्यापारिक कॉरिडोर, भारत-यूरोपीय संघ ग्रीन शिपिंग पहल और मैरीटाइम अमृत काल विजन जैसे विषय इस बदलती समुद्री व्यवस्था के अलग-अलग आयाम सामने रखते हैं।
दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश समुद्री सुरक्षा, आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और समावेशी आजीविका के बीच कितना प्रभावी संतुलन बना पाते हैं। महासागरों को प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र के साथ-साथ सहयोग के साझा मंच के रूप में विकसित करना आने वाले वर्षों की एक महत्वपूर्ण वैश्विक प्राथमिकता होगी।




