सागरमंथन 2026 का दूसरा दिन : मध्य पूर्व की समुद्री सुरक्षा से AI, ग्रीन पोर्ट्स और ब्लू इकोनॉमी तक
भारत के बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्रालय के संयुक्त आयोजन का उद्देश्य बदलते वैश्विक परिदृश्य में महासागरों की भूमिका और समुद्री सहयोग की नई संभावनाओं पर हुआ मंथन

नई दिल्ली : ‘सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग 2026’ के दूसरे दिन, 8 अक्टूबर को वैश्विक समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक कॉरिडोर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन शिपिंग और समावेशी समुद्री अर्थव्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) और भारत के बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्रालय के संयुक्त आयोजन का उद्देश्य बदलते वैश्विक परिदृश्य में महासागरों की भूमिका और समुद्री सहयोग की नई संभावनाओं पर चर्चा करना है।
कार्यक्रम की विषयवस्तु में मध्य पूर्व के रणनीतिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ग्लोबल साउथ की भागीदारी, भारत-दक्षिण कोरिया औद्योगिक सहयोग, स्मार्ट बंदरगाह, आधुनिक जहाज निर्माण और समुद्री क्षेत्र में महिलाओं तथा युवाओं की भूमिका जैसे विषय शामिल रहे। इन चर्चाओं का व्यापक उद्देश्य समुद्री अर्थव्यवस्था को अधिक सुरक्षित, प्रतिस्पर्धी, टिकाऊ और समावेशी बनाने के रास्ते तलाशना था।
‘बदलाव के दौर में मध्य पूर्व: स्थिरता, कनेक्टिविटी और इंडो-पैसिफिक हित’ शीर्षक सत्र में होर्मुज़ जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर ध्यान दिया गया। यह कार्यक्रम ORF मिडिल ईस्ट और जापान इंस्टीट्यूट ऑफ मिडिल ईस्टर्न इकोनॉमीज़ सेंटर-इंस्टीट्यूट ऑफ एनर्जी इकोनॉमिक्स (JIME-IEEJ) के सहयोग से जुड़ा था।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि लाल सागर और उससे जुड़ा समुद्री मार्ग एशिया-यूरोप व्यापार में अहम भूमिका निभाता है। इन क्षेत्रों में तनाव या व्यवधान से माल ढुलाई, बीमा और ऊर्जा की लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव भारत और जापान जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।
इस सत्र के पहले पैनल में समुद्री और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुपक्षीय सहयोग, नौसैनिक समन्वय तथा खुफिया जानकारी साझा करने की संभावनाओं पर विचार किया गया। भारत, जापान और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के बीच सहयोग को मजबूत बनाने के साथ वैकल्पिक परिवहन मार्गों और रणनीतिक भंडार जैसे दीर्घकालिक उपायों की व्यवहार्यता भी चर्चा के प्रमुख विषय रहे।
दूसरे पैनल में भू-अर्थशास्त्र, सप्लाई चेन की मजबूती और वैकल्पिक कॉरिडोर पर ध्यान दिया गया। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), इराक-यूरोप डेवलपमेंट रोड, बसरा-अकाबा पाइपलाइन और मिडिल कॉरिडोर जैसी पहलों के माध्यम से व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने की संभावनाओं पर विचार किया गया।
‘चोकपॉइंट्स और शॉकवेव्स: ग्लोबल ट्रेड की मुख्य धमनियों को सुरक्षित करना’ शीर्षक पूर्ण सत्र में रणनीतिक समुद्री मार्गों में व्यवधान के व्यापक आर्थिक प्रभावों पर जोर दिया गया।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य, लाल सागर और अन्य प्रमुख समुद्री मार्गों में अस्थिरता से जहाजों के रास्ते बदलने, माल ढुलाई की लागत बढ़ने और सप्लाई चेन प्रभावित होने का जोखिम रहता है। ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव भी ऐसे व्यवधानों का महत्वपूर्ण परिणाम हो सकता है।
चर्चा की रूपरेखा में इस बात पर ध्यान दिया गया कि सरकारें, उद्योग जगत और वित्तीय संस्थान जोखिम प्रबंधन, व्यापार मार्गों में विविधता और बेहतर अंतरराष्ट्रीय समन्वय के माध्यम से समुद्री नेटवर्क को कैसे मजबूत बना सकते हैं। बदलते भू-राजनीतिक माहौल में समुद्री सुरक्षा को आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।
समुद्री क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग सागरमंथन 2026 के प्रमुख तकनीकी विषयों में शामिल रहा। ‘AI और समुद्री क्षेत्र का भविष्य: इंटेलिजेंट महासागर की ओर बढ़ना’ सत्र में स्मार्ट लॉजिस्टिक्स, स्वचालित जहाजों, डिजिटल ट्विन्स, उन्नत डेटा विश्लेषण और स्मार्ट पोर्ट सिस्टम की संभावनाओं पर चर्चा की गई।
AI आधारित तकनीक जहाजों के संचालन को अधिक कुशल बनाने, माल की आवाजाही पर नजर रखने, बंदरगाहों पर भीड़ कम करने और संभावित व्यवधानों का पूर्वानुमान लगाने में मदद कर सकती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म सीमा-पार व्यापार प्रक्रियाओं और डेटा के आदान-प्रदान को भी बेहतर बना सकते हैं।
हालांकि, इन तकनीकों का लाभ उठाने के लिए डिजिटल बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा, प्रशिक्षित कार्यबल और निवेश की आवश्यकता होगी। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सामने चुनौती केवल नई तकनीक अपनाने की नहीं, बल्कि उसके विकास और वैश्विक मानकों को आकार देने में भागीदारी सुनिश्चित करने की भी है।
‘ग्रीन पोर्ट मॉडल: जहां व्यापार और ऊर्जा मिलते हैं’ सत्र में बंदरगाहों को पारंपरिक कार्गो केंद्रों से एकीकृत लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा केंद्रों में बदलने पर ध्यान दिया गया।
इस बदलाव में बंदरगाहों का विद्युतीकरण, तट से जहाजों को बिजली उपलब्ध कराना, नवीकरणीय ऊर्जा, वैकल्पिक ईंधन के लिए बंकरिंग सुविधाएं और ऊर्जा भंडारण जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। ग्रीन अमोनिया, ग्रीन मेथनॉल और हाइड्रोजन आधारित प्रणालियां समुद्री क्षेत्र में उत्सर्जन कम करने के संभावित विकल्पों में शामिल हैं।
ग्रीन पोर्ट विकसित करने के लिए बड़े निवेश, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, स्पष्ट नियामकीय ढांचे और तकनीकी मानकों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। इससे बंदरगाहों की परिचालन दक्षता बढ़ाने के साथ वैश्विक व्यापार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत करने की संभावनाएं बन सकती हैं।
कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक पॉलिसी (KIEP) से जुड़े कार्यक्रम ‘भारत-कोरिया औद्योगिक बदलाव: समावेशी हरित बदलाव की ओर’ में जहाज निर्माण, वैकल्पिक ईंधन, बंदरगाह आधारित औद्योगिक क्लस्टर और समुद्री बुनियादी ढांचे पर ध्यान दिया गया।
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच औद्योगिक सहयोग से आधुनिक जहाज निर्माण, तकनीक हस्तांतरण, वित्तपोषण और कुशल कार्यबल के विकास को बढ़ावा देने की संभावनाएं हैं। हरित औद्योगिक बदलाव के लिए केवल तकनीकी निवेश पर्याप्त नहीं होगा; इसके साथ श्रमिकों के कौशल विकास और तटीय समुदायों की आजीविका को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
इस चर्चा में सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप औद्योगिक विकास, अच्छे रोजगार और जलवायु कार्रवाई को एक साथ आगे बढ़ाने के महत्व को रेखांकित किया गया।
‘ग्लोबल साउथ की भागीदारी: समुद्री भविष्य को आकार देना’ सत्र में विकासशील देशों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया। ग्रीन शिपिंग, डिजिटल तकनीक और नए वैश्विक मानक समुद्री उद्योग का भविष्य तय कर रहे हैं। ऐसे में विकासशील देशों के लिए वित्त, तकनीक, कौशल और निर्णय प्रक्रिया तक बेहतर पहुंच आवश्यक है।
‘समुद्र में BRICS+: साउथ-साउथ कनेक्टिविटी की नई सोच’ सत्र में बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, समुद्री सेवाओं और हरित परिवर्तन में सहयोग की संभावनाओं पर ध्यान दिया गया। निवेश, तकनीकी साझेदारी और क्षमता निर्माण के जरिए उभरती अर्थव्यवस्थाएं अधिक विविध और लचीले व्यापार नेटवर्क विकसित कर सकती हैं।
इसके साथ ‘ब्लू जस्टिस’ विषय ने समुद्री अर्थव्यवस्था में समान अवसरों, संसाधनों के न्यायसंगत बंटवारे और तटीय समुदायों की भागीदारी जैसे मुद्दों को सामने रखा।
‘ओशन चेंजमेकर्स: महिलाएं, युवा और भारत की समुद्री यात्रा’ सत्र में समुद्री क्षेत्र में महिलाओं और युवाओं के योगदान पर ध्यान केंद्रित किया गया। समुद्री उद्योग के भविष्य के लिए विविध प्रतिभाओं, कौशल विकास और नेतृत्व के अवसरों को महत्वपूर्ण माना गया।
‘ग्रीन शिप, स्मार्ट यार्ड’ सत्र में कम उत्सर्जन वाले जहाजों, डिजिटल विनिर्माण, आधुनिक शिपयार्ड और उन्नत औद्योगिक क्षमताओं पर विचार किया गया। वैश्विक जहाज निर्माण में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के बीच उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचे, तकनीक, कुशल श्रमिकों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में निवेश जरूरी है।
‘ग्लोबल ट्रेड का नया ढांचा’ और ‘महत्वाकांक्षा से कार्रवाई तक’ जैसे सत्रों में शिपिंग, बंदरगाह, जहाज निर्माण, लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा नेटवर्क को एकीकृत समुद्री अर्थव्यवस्था के हिस्से के रूप में देखने पर जोर दिया गया।
सागरमंथन 2026 के दूसरे दिन की विषयवस्तु ने समुद्री क्षेत्र के सामने मौजूद सुरक्षा, तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के व्यापक स्वरूप को सामने रखा। मध्य पूर्व के समुद्री मार्गों की सुरक्षा से लेकर AI, ग्रीन पोर्ट्स, आधुनिक जहाज निर्माण और ग्लोबल साउथ की भागीदारी तक, विभिन्न मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
भारत के लिए इन क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी क्षमता, औद्योगिक निवेश और टिकाऊ नीतियों को मजबूत करना महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। भविष्य की समुद्री अर्थव्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करते हुए पर्यावरण संरक्षण, समावेशी विकास और तटीय समुदायों के हितों के बीच कितना प्रभावी संतुलन बना पाते हैं।

