भारत-जापान सहयोग से वन प्रबंधन को मिलेगी मजबूती, 537 करोड़ की परियोजना पर काम शुरू
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने शुरू की प्रभावी वन प्रबंधन के लिए क्षमता संवर्धन कार्यशाला

क्षमता संवर्धन परियोजना (2025-26 से 2031-32) का उद्देश्य वन एवं वन्यजीव प्रबंधन की बदलती आवश्यकताओं, उभरती जलवायु एवं पर्यावरणीय चिंताओं और क्षेत्र में उनकी बढ़ती विविध जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए अग्रिम पंक्ति के वन कर्मियों की क्षमता को बढ़ाना है। इसमें ज्ञान और अनुसंधान परिणामों को अधिक प्रभावशाली प्रशिक्षण और स्थायी वन प्रबंधन पद्धतियों में लागू करने के लिए अनुसंधान एवं विकास को सुदृढ़ करने की योजना भी शामिल है।इसमें ज्ञान और अनुसंधान परिणामों को बेहतर प्रशिक्षण और टिकाऊ वन प्रबंधन प्रथाओं में परिणत करने के लिए अनुसंधान एवं विकास को मजबूत करने की भी परिकल्पना की गई है।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए श्री यादव ने कहा कि यह परियोजना वन क्षेत्र में भारत और जापान के बीच दशकों से चले आ रहे सहयोग में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव विविधता के संरक्षण और वन-आश्रित समुदायों की आजीविका को बनाए रखने के लिए वन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मंत्री ने परिचालन और प्रशासनिक दोनों दृष्टिकोणों से वन कर्मियों की क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
वनाग्नि प्रबंधन को वैश्विक चुनौती बताते हुए श्री यादव ने कहा कि यह परियोजना वनाग्नि प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के क्षेत्र में तकनीकी और जमीनी स्तर की क्षमताओं को बढ़ाने की अपार क्षमता रखती है। उन्होंने कहा कि क्षमता निर्माण केवल कक्षा प्रशिक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीकों और जमीनी स्तर पर सर्वोत्तम उपायों के प्रयोग पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, साथ ही स्थानीय समुदायों के ज्ञान और अनुभव को भी शामिल किया जाना चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने स्थानीय ज्ञान और चुनौतियों को प्रतिबिंबित करने वाले क्षेत्र-विशिष्ट क्षमता निर्माण मॉड्यूल विकसित करने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने परियोजना के प्रमुख आयामों की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिनमें व्यावहारिक तकनीकी समाधान विकसित करने के लिए शोध और विकास, जमीनी स्तर पर नई तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पायलट परियोजनाएं और प्रशिक्षण संस्थानों को मजबूत करने पर काम किया जाएगा। इसके साथ ही, सार्क और अन्य विकासशील देशों के साथ बेहतर कार्यप्रणालियां साझा की जाएंगी। उन्होंने कार्यशाला की चर्चाओं को पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उभरती प्रौद्योगिकियों के संयोजन के माध्यम से जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई में बदलने का आह्वान किया।
इस अवसर पर बोलते हुए, जेआईसीए इंडिया कार्यालय के वरिष्ठ प्रतिनिधि श्री एइजी वाकामात्सु ने कहा कि इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय और जापानी अनुसंधान संस्थानों को एक मंच प्रदान करना है ताकि वैश्विक चुनौतियों के समाधान विकसित किए जा सकें और वन प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में विकासशील देशों में भारत के नेतृत्व को मजबूत किया जा सके। उन्होंने बताया कि वानिकी क्षेत्र में भारत के साथ जेआईसीए की साझेदारी लगभग तीन दशकों से चली आ रही है और इससे 7 लाख से अधिक लोगों को लाभ हुआ है।
श्री वाकामात्सु ने कहा कि परियोजना का दूसरा चरण 2025-26 से 2031-32 तक चलेगा। इस चरण में लकड़ी के प्रसंस्करण और आजीविका सृजन, बेहतर वन प्रबंधन के लिए डिजिटल रूपांतरण और सहयोगात्मक अकादमिक अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि जेआईसीए सतत वन प्रबंधन और क्षमता निर्माण के लिए भारत के केंद्र और राज्य सरकारों के साथ अपने सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
इससे पहले केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालाय के एडीजी (वन्यजीव) श्री रमेश पांडे ने जानकारी दी कि इस परियोजना का कुल परिव्यय 537.10 करोड़ रुपए है, जिसमें जेआईसीए का योगदान 440.42 करोड़ रुपए और भारत सरकार का हिस्सा 96.68 करोड़ रुपए है। यह परियोजना 2025-26 से 2031-32 तक सात वर्षों में कार्यान्वित की जाएगी। इस परियोजना में भारत के सभी राज्य शामिल होंगे। नए भागीदार राज्यों को प्राथमिकता दी जाएगी और साथ ही साथ उन राज्यों को भी सहायता प्रदान की जाएगी जो पहले से ही किसी संबंधित परियोजना में शामिल थे।
यह परियोजना पहले से मौजूद जेआईसीए की पहल पर आधारित है और इसका उद्देश्य सतत वन प्रबंधन और वन क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों की क्षमताओं को और अधिक सुदृढ़ करना है। इस अवसर पर परियोजना विवरणिका का भी विमोचन किया गया, जिसमें परियोजना के प्रमुख उद्देश्यों और सहयोग के क्षेत्रों का वर्णन किया गया है। कार्यशाला के तकनीकी सत्र में मंत्रालय द्वारा परियोजना के उद्देश्यों और कार्यक्षेत्र पर प्रस्तुति दी गई। इस दौरान जेआईसीए प्रतिनिधियों के दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए और राज्यों, अनुसंधान संस्थानों और केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के साथ एक संवादात्मक सत्र भी आयोजित किया गया।

