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नदी उत्सव का असली मकसद यमुना के साथ एक हो जाना और नदी के साथ अपने रिश्ते को फिर से नया करना है : डॉ. सच्चिदानंद जोशी

आईजीएनसीए में 7वें नदी उत्सव का हुआ समापन

नई दिल्ली: जब कोई नदी बहती है, तो उसके साथ सिर्फ़ पानी ही नहीं बहता; उसके बहाव के साथ सभ्यताएँ आगे बढ़ती हैं, यादें बहती हैं, लोक गीतों की धुनें सफ़र करती हैं और पीढ़ियों की कहानियाँ एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँचती हैं। जीवन देने वाले इस बहाव, सांस्कृतिक यादों और इंसानों व प्रकृति के बीच के रिश्ते को समर्पित, तीन दिन तक चलने वाले 7वें नदी उत्सव का इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में शानदार समापन हुआ। 24 सितंबर को शुरू हुए इस उत्सव के आखिरी दिन सोच, सिनेमा, फ़ोटोग्राफ़ी, थिएटर और संरक्षण की अलग-अलग धाराएँ एक साथ आईं, जिससे नदियों के प्रति व्यापक सांस्कृतिक चेतना का जश्न मनाया गया।
समापन समारोह में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए। इस मौके पर द यमुना रिवर इनिशिएटिव (यारी) की मानद सचिव सुश्री अंबिका पंत, आईजीएनसीए के जनपद संपदा विभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार, मीडिया सेंटर के कंट्रोलर अनुराग पुनेठा और नदी उत्सव के संयोजक अभय मिश्रा के साथ-साथ कला और संस्कृति के कई प्रेमी, विशेषज्ञ, कलाकार और दर्शक भी मौजूद थे।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि भले ही उनका यमुना से सीधा जुड़ाव न रहा हो, लेकिन उनके जीवन के अलग-अलग पड़ाव इसकी सहायक नदियों – चंबल, बेतवा और केन – से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी पते को नदी से जोड़ना सिर्फ़ एक भौगोलिक पहचान नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति और जीवन शैली के साथ उसके गहरे रिश्ते को भी दिखाता है। नर्मदा से जुड़ी एक पुरानी घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पहले समाज में नदियों की परंपराओं और उनके सांस्कृतिक स्वरूप के प्रति गहरी संवेदनशीलता थी। आज हमें इस बात पर विचार करने की ज़रूरत है कि क्या हम भी अपनी नदियों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं।
डॉ. जोशी ने कहा कि यमुना पर आयोजित तीन दिवसीय ‘नदी उत्सव’ का मकसद सिर्फ़ रस्म-रिवाज़ निभाना नहीं है, बल्कि समाज और नदी के बीच के रिश्ते को फिर से ज़िंदा करना है। प्रशासन और सिस्टम अपनी-अपनी भूमिका निभाएंगे, लेकिन एक समाज के तौर पर हमारी भी कुछ ज़िम्मेदारियाँ हैं। नरेश सक्सेना की एक कविता का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पुल पार करने का मतलब नदी पार करना नहीं होता; नदी को समझने के लिए उसमें उतरना और उसके साथ जुड़ना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि ‘नदी उत्सव’ का असली मक़सद यमुना के साथ एक हो जाना और नदी के साथ अपने रिश्ते को फिर से बेहतर बनाने का सामूहिक संकल्प लेना है।
अंबिका पंत ने कहा कि सातवें ‘नदी उत्सव’ से जुड़ना उनके लिए बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। ‘यमुना रिवर इनिशिएटिव’ स्कूलों में चलाया जाने वाला एक प्रोग्राम है, जिसका मकसद बच्चों को नदी से फिर से जोड़ना है। इस प्रोग्राम के दौरान यह बात परेशान करने वाली लगी कि बच्चे यमुना के बारे में बहुत कम जानते हैं। उन्हें यह भी नहीं पता कि यमुना का 22 किलोमीटर का प्रदूषित हिस्सा ही पूरी नदी की पहचान नहीं है।
औपचारिक धन्यवाद प्रस्ताव पेश करते हुए प्रो. के. अनिल कुमार ने ‘नदी उत्सव’ से जुड़े सभी लोगों का शुक्रिया अदा किया और कहा कि ‘नदी उत्सव’ नदियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और दूसरे पहलुओं पर चर्चा करने का एक शानदार मंच है। उन्होंने कहा कि इस उत्सव से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और नदियों के कई पहलुओं के बारे में नई समझ पैदा हुई।
मीडिया सेंटर के कंट्रोलर अनुराग पुनेठा ने कहा कि जब हम नदी की हालत पर सवाल उठाते हैं, तो हमें नदी के करीब भी जाना चाहिए। तभी हम लोगों को इसकी संवेदनशीलता का एहसास करा सकते हैं और इसके बारे में गहरी समझ विकसित कर सकते हैं। डॉक्यूमेंट्री बनाने वालों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सभी फिल्ममेकर्स अपनी कोशिशों के लिए पूरी तारीफ़ के हकदार हैं।
‘नदी उत्सव’ के संयोजक अभय मिश्रा ने कहा कि नदियाँ आज के जीवन को दिखाती और उसकी झलक पेश करती हैं। ‘लुप्त’ प्रदर्शनी की एक तस्वीर का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि, जैसे आजकल लोग रेड लाइट पर रुकना या उसे देखना पसंद नहीं करते, वैसे ही हम अपने सामने मौजूद सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं या उसे देखे बिना आगे बढ़ रहे हैं।
नदी उत्सव के डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म फ़ेस्टिवल, ‘द रिवर एज़ एन आर्काइविस्ट’ (The River as an Archivist) ने दर्शकों को नदियों को जीवित अभिलेखागार (living archives) के रूप में देखने का मौका दिया। समापन सत्र के दौरान, फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाई गई चुनिंदा फ़िल्मों को पुरस्कार दिए गए।
पहला पुरस्कार देवांग सैकिया की असमिया भाषा की फ़िल्म ‘नॉयर कथा – टेल्स ऑफ़ द रिवरिन’ (Noir Katha – Tales of the Riverine) और बिस्वजीत दास की असमिया भाषा की फ़िल्म ‘वेयर डिड अवर रिवर फ़्लो टू’ (Where Did Our River Flow To) को दिया गया।
दूसरा पुरस्कार जयश्री बोरगोहेन की नेपाली भाषा की फ़िल्म ‘व्हेन इट ऑल वेंट डार्क’ (When It All Went Dark) को तथा तीसरा पुरस्कार सलमा सुल्ताना की हिंदी और बंगाली भाषा की फ़िल्म ‘बराक: बियॉन्ड द मैप’ (Barak: Beyond the Map) को दिया गया।

फ़ेस्टिवल के आखिरी दिन ‘यमुना की दो सदियां : नदी की चौड़ाई से उसके बदलते बहाव का पुनर्निर्माण’ (Two Centuries of Yamuna: Reconstructing Its Changing Flow from River Width) विषय पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। वक्ताओं ने यमुना के बदलते रास्ते और उसके ऐतिहासिक स्वरूप पर अपने विचार रखे।
नवीन वत्स ने नदी फ़ोटोग्राफ़ी पर एक विशेष बातचीत के ज़रिए कैमरे से नदियों को देखने और उनके बदलते दृश्य परिदृश्य (visual landscape) को रिकॉर्ड करने की कला पर चर्चा की। ग्रीन इंडिया फ़ाउंडेशन की ओर से ‘नदियां जमीन पर शुरू होती हैं : भारत में जंगल, बाढ़ के मैदान और नदी बहाली’ (Rivers Begin on Land: Forests, Floodplains and River Restoration in India) विषय पर एक विशेष प्रस्तुति में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि नदी की कहानी उसके स्रोत से बहुत पहले शुरू हो जाती है। यह जंगल, पहाड़, बारिश, मिट्टी और बाढ़ के मैदानों से आकार लेती है। इसलिए, नदी का पुनरुद्धार उसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और संरक्षण से जुड़ा है।
फ़ेस्टिवल के तीसरे दिन का एक खास आकर्षण फूलकुमारी द्वारा निर्देशित लाइव थिएटर प्रस्तुति ‘यमुना ट्रैवल्स प्राइवेट अनलिमिटेड’ (Yamuna Travels Private Unlimited) थी। इस प्रस्तुति ने दर्शकों को नदी के साथ अपने रिश्ते पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित किया।
इन तीन दिनों के दौरान, नदी अलग-अलग मौकों पर लोगों की आवाज़, इतिहास का दस्तावेज़, सिनेमा का विषय, फ़ोटोग्राफ़र का नज़रिया और मंच पर एक जीवित पात्र के रूप में उभरकर सामने आई। इस उत्सव ने यह संदेश दिया कि नदियों को समझने का मतलब असल में हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य को समझना है।

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Amresh Dwivedi

अमरेश द्विवेदी देश की एकमात्र बहुभाषी न्यूज़ एजेंसी हिंदुस्थान समाचार में कार्यरत हैं। इसके अलावा हिंदुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका युगवार्ता और मासिक पत्रिका नवोत्थान के साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी उनके आलेख छपते रहते हैं।

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