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Unnao New SP City: अपराध के चौतरफा घेरे में आयुष श्रीवास्तव, गौ तस्करी से साइबर ठगी तक—जनता के सामने पुराने सवाल फिर खड़े

उन्नाव के नए एसपी सिटी आयुष श्रीवास्तव के सामने गौ तस्करी, हत्या-लूट, साइबर ठगी और महिला-बाल सुरक्षा की बड़ी चुनौतियां। नया चेहरा, पुरानी चुनौतियां—उन्नाव में बदलाव की उम्मीद और सवालों का अंबार जानें पूरी रिपोर्ट।

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में जिलों के बीच पुलिस अधिकारियों का बड़ा फेरबदल किया है। इसी कड़ी में जौनपुर में तैनात युवा आईपीएस अधिकारी आयुष श्रीवास्तव को उन्नाव का नया एसपी सिटी (Unnao New SP City) बनाकर भेजा गया है। श्रीवास्तव 2021 बैच के अधिकारी हैं और जौनपुर में करीब दो साल काम करने के बाद अब उन्नाव पहुंचे हैं। लेकिन उनका स्वागत फूल-मालाओं से ज्यादा चुनौतियों की एक लंबी सूची से हो रहा है — हत्या, लूट, साइबर ठगी, महिलाओं और बच्चों पर होने वाले अत्याचार, और सबसे खतरनाक, गौ तस्करी का संगठित नेटवर्क।

यह सिर्फ एक नए अफसर की तैनाती की खबर नहीं है। यह उन्नाव जैसे जिले की उस पुरानी और बार-बार दोहराई जाने वाली कहानी का एक और अध्याय है, जहां हर नए अफसर से उम्मीद बंधती है, और फिर वही पुराने अपराधी, वही पुराने तरीके, वही पुराने आंकड़े सामने आ जाते हैं।

आंकड़ों की डरावनी तस्वीर: हर महीने 7-8 हत्याएं, 2.5 करोड़ की साइबर ठगी

अगर सिर्फ पिछले एक-डेढ़ साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर डरावनी है।

साल 2025 में अकेले उन्नाव जिले में 83 हत्याएं दर्ज हुईं। यानी हर महीने औसतन सात से आठ लोगों की जान गई। इसके अलावा हत्या के प्रयास के 120 मामले दर्ज हुए, जिसका मतलब है कि कई मामलों में पीड़ित किसी तरह बच गए, लेकिन हमलावरों की मंशा हत्या करने की ही थी।

लूट के 39 और डकैती के 6 मामले दर्ज हुए। चोरी के 202 और नकबजनी (सेंधमारी करके घर में घुसकर चोरी) के 72 केस सामने आए। इन आंकड़ों से पता चलता है कि संपत्ति संबंधी अपराध भी जिले में आम बात हो चुके हैं।

संगठित अपराध पर नजर डालें तो गैंगस्टर एक्ट के तहत 38 मुकदमे दर्ज किए गए, जिनमें कुल 145 आरोपियों पर कार्रवाई की गई। इसके साथ ही अवैध शराब के 426 मामले और अवैध हथियारों से जुड़े दर्जनों केस भी दर्ज हुए। इतनी बड़ी संख्या में अवैध हथियार और शराब के मामले यह बताते हैं कि जिले में अपराध की जड़ें कितनी गहरी हैं।

अब बात करते हैं 2026 की, जो अभी जारी साल है। जनवरी से सितंबर तक साइबर ठगी के 103 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। इनमें से 57 आरोपियों पर कार्रवाई हो चुकी है। ठगी की रकम भी चौंकाने वाली है — करीब दो करोड़ 54 लाख रुपये लोगों से ठगे जा चुके हैं, जबकि इसमें से सिर्फ 60 लाख रुपये ही पीड़ितों को वापस मिल पाए हैं। यानी हर 100 रुपये की ठगी में से सिर्फ 23-24 रुपये ही वापस आ पा रहे हैं। बाकी पैसा या तो साइबर अपराधियों के पास चला गया है, या जांच में उलझा हुआ है।

सितंबर 2026: जब 6 साल की मासूम के साथ हुआ दुष्कर्म, पूरा जिला सहम गया

सितंबर 2026 के दिनों को देखें तो लगभग हर दिन कोई न कोई गंभीर घटना सामने आई है।

सबसे दिल दहला देने वाली घटना एक छह साल की मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म की है। इतनी छोटी उम्र की बच्ची के साथ हुई इस वारदात ने पूरे जिले को झकझोर दिया। इसके बाद से माता-पिता अपने बच्चों को लेकर और सतर्क हो गए हैं। कई परिवारों ने बताया कि अब वे रात को सोने से पहले घर के दरवाजे दोहरी चटकनी से बंद करते हैं, यह सोचकर कि बाहर का खतरा घर के अंदर तक न पहुंच जाए।

इसी दौरान एक परचून दुकानदार के साथ लूट की घटना हुई, जिसमें सुधीर और विष्णु नाम के आरोपियों को पुलिस ने पकड़ा। यह दिखाता है कि छोटे दुकानदार भी अब अपराधियों के निशाने पर हैं, जो अक्सर रोजमर्रा की कमाई करने वाले आम लोग होते हैं।

अवैध तमंचों के साथ साहिल और मिथिलेश धानुक नाम के दो लोगों को गिरफ्तार किया गया। अवैध हथियारों की इतनी आसान उपलब्धता यह बताती है कि जिले में हथियार तस्करी का एक समानांतर नेटवर्क भी सक्रिय है।

गैंगस्टर एक्ट के तहत फरार चल रहे राजेंद्र प्रसाद, जिसे विजय के नाम से भी जाना जाता है, अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर है। ऐसे फरार आरोपियों की मौजूदगी जनता के मन में यह डर बनाए रखती है कि कानून का डर अपराधियों में कम होता जा रहा है।

हत्या के एक मामले में उमंग त्रिपाठी नाम के आरोपी को पकड़ा गया, जबकि महिलाओं से छेड़छाड़ के एक मामले में आनंद कुमार नाम के आरोपी की गिरफ्तारी हुई। पुलिस हर दिन किसी न किसी आरोपी को पकड़ने का दावा कर रही है, लेकिन जिस रफ्तार से नए मामले दर्ज हो रहे हैं, उस रफ्तार से अपराध थमने का नाम नहीं ले रहा।

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गौ तस्करी: सबसे खतरनाक और सबसे पुराना नेटवर्क

इन सारी घटनाओं के बीच जो सबसे संगठित और सबसे खतरनाक नेटवर्क है, वह है गौ तस्करी का। उन्नाव की सीमावर्ती और जंगली इलाके इस तस्करी के लिए एक तरह से सुरक्षित पनाहगाह बने हुए हैं।

पुलिस के पुराने रिकॉर्ड में कुछ नाम बार-बार सामने आते रहे हैं। इनमें सबसे पहला नाम है रफीक का, जो जुम्मन का बेटा है और क्वेथर जमुनाखेड़ा गांव का रहने वाला है। दूसरा नाम है मनमोहन यादव का, जो स्वर्गीय वेनी माधव का बेटा है और शिवगढ़ इलाके का निवासी है। ये दोनों गौ तस्करी के पुराने और अनुभवी खिलाड़ी माने जाते हैं। एक मुठभेड़ के दौरान रफीक के पैर में गोली भी लगी थी, जबकि उसका एक साथी मौके से फरार हो गया था।

इनके अलावा गजियाखेड़ा गांव का सुनील, पीपरखेड़ा डेरावाला का अमरपाल यादव, जिसे छोटू यादव भी कहा जाता है, और दयालखेड़ा का लल्लन — इन तीनों नामों को भी गौ तस्करी और संगठित अपराध से जोड़कर देखा जाता है। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि ये लोग सिर्फ मवेशियों की तस्करी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हत्या, लूट और हथियार तस्करी जैसे अन्य गंभीर अपराधों में भी शामिल रहे हैं। जिला बदर किए गए अपराधियों की सूची में भी इनके नाम दर्ज हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि रफीक और मनमोहन जैसे नाम असल में छोटे खिलाड़ी हैं, और इस पूरे नेटवर्क का असली सरगना कहीं और बैठकर यह पूरा खेल चला रहा है। पुलिस को जब सूचना मिलती है, तो छापेमारी होती है, लेकिन ज्यादातर मामलों में हाथ सिर्फ छोटे आरोपियों तक ही पहुंच पाता है।

नए एसपी सिटी आयुष श्रीवास्तव के सामने चुनौती

आयुष श्रीवास्तव जौनपुर में अपनी सक्रियता के लिए जाने जाते रहे हैं। वहां उनके नेतृत्व में कई अहम मामलों का खुलासा हुआ था। लेकिन उन्नाव की चुनौती अलग और कहीं बड़ी है। यहां एक साथ चार मोर्चे खुले हुए हैं — गौ तस्करी, हत्या-लूट जैसे संगठित अपराध, साइबर ठगी, और महिलाओं-बच्चों की सुरक्षा। इनमें से किसी एक पर भी निर्णायक कार्रवाई करना आसान नहीं होगा।

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता रामप्रकाश यादव इस बारे में कहते हैं कि नए एसपी जौनपुर से आए हैं, जहां उन्होंने अच्छा काम किया, लेकिन उन्नाव अलग जिला है। उनका कहना है कि यहां रफीक, मनमोहन, सुनील, अमरपाल और लल्लन जैसे गौ तस्करों के नाम सब जानते हैं, और अगर इन्हें सलाखों के पीछे नहीं पहुंचाया गया तो जनता का पुलिस पर से भरोसा टूट जाएगा।

पहले भी यही कहानी दोहराई जा चुकी है—दीपक भूकर का उदाहरण

उन्नाव के पुलिस इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब किसी नए अफसर से जिले को अपराध-मुक्त बनाने की उम्मीद जताई गई हो। इससे पहले दीपक भूकर उन्नाव के पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं। उनके कार्यकाल में भी कई थाना प्रभारियों और उपनिरीक्षकों के तबादले किए गए, सैकड़ों की संख्या में शराब और हथियार तस्करी के मामलों में कार्रवाई हुई, और साइबर क्राइम पुलिस ने लाखों रुपये पीड़ितों को वापस भी दिलाए।

लेकिन कुछ समय बाद दीपक भूकर का तबादला उन्नाव से प्रतापगढ़ कर दिया गया। स्थानीय स्तर पर यह बात कही जाती है कि कुछ थाना क्षेत्रों में प्रभारियों की लापरवाही और स्थानीय जन-प्रतिनिधियों के दबाव ने भी इस तबादले में भूमिका निभाई — हालांकि इस बारे में कोई आधिकारिक पुष्टि या दस्तावेजी सबूत सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे अफवाह या स्थानीय चर्चा से ज्यादा तथ्य की तरह नहीं लिया जाना चाहिए। जो बात तथ्य के तौर पर पुष्ट है, वह यह है कि उनके जाने के बाद जिले में अपराध की वही पुरानी लहर फिर लौट आई, जैसा कि ऊपर दिए गए आंकड़े और सितंबर 2026 की घटनाएं दिखाती हैं।

यह पैटर्न उन्नाव जैसे जिलों की एक बड़ी समस्या की तरफ इशारा करता है — जब तक अपराध पर कार्रवाई सिर्फ ऊपर के अफसर के व्यक्तिगत प्रयासों पर निर्भर रहेगी, और नीचे के थाना स्तर पर जवाबदेही मजबूत नहीं होगी, तब तक अफसर बदलते रहेंगे, लेकिन अपराध का ढांचा जस का तस बना रहेगा।

महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा: मिशन शक्ति के बावजूद बढ़ते मामले

मिशन शक्ति अभियान के तहत छेड़छाड़ करने वाले आरोपियों की गिरफ्तारी लगातार हो रही है, लेकिन घटनाओं की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही। छह साल की बच्ची के साथ हुई वारदात ने यह साबित कर दिया कि अपराधी अब सबसे कमजोर वर्ग को भी नहीं बख्श रहे। इसका सीधा असर आम परिवारों की मानसिक स्थिति पर पड़ा है—बच्चों को अकेले बाहर भेजने से पहले अब माता-पिता कई बार सोचते हैं। पारंपरिक अपराधों के अलावा साइबर ठगी अब जिले के लिए एक नई और तेजी से फैलती हुई समस्या बन चुकी है। सिर्फ नौ महीनों में सवा सौ से ज्यादा मामले दर्ज होना और ढाई करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी होना यह दिखाता है कि अपराधी अब सिर्फ सड़क पर नहीं, बल्कि मोबाइल और इंटरनेट के जरिए भी आम लोगों को निशाना बना रहे हैं।

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नए एसपी सिटी आयुष श्रीवास्तव: करियर, तैनाती और चर्चित मामले

डीजीपी मुख्यालय से जौनपुर तक पहली तैनाती

आयुष श्रीवास्तव 2021 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। उनकी पहली फील्ड पोस्टिंग 19 सितंबर 2024 को हुई, जब उन्हें लखनऊ स्थित डीजीपी मुख्यालय से जौनपुर भेजा गया और वहां सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी) का कार्यभार सौंपा गया। यानी जौनपुर उनकी करियर की पहली बड़ी फील्ड जिम्मेदारी थी, जहां से उन्होंने अपने काम की शुरुआत की।

करीब छह महीने बाद, 18 मार्च 2025 को उन्हें पदोन्नति मिली और उन्हें अपर पुलिस अधीक्षक नगर (एएसपी सिटी) की जिम्मेदारी दी गई। इस तरह जौनपुर में उनका कुल कार्यकाल करीब दो साल का रहा, जिसके बाद अब सितंबर 2026 में उन्हें उन्नाव भेजा गया है।

जौनपुर में फर्जी जन्म प्रमाणपत्र गिरोह का भंडाफोड़

अपने कार्यकाल के दौरान आयुष श्रीवास्तव के नेतृत्व में जौनपुर पुलिस ने एक बड़े अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया, जो फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनाने का काम करता था। इस मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उनके पास से नौ एंड्रॉइड मोबाइल फोन तथा चार लैपटॉप बरामद हुए।

जांच में सामने आया कि यह गिरोह उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तराखंड के सरकारी अधिकारियों की लॉगिन आईडी चुराकर उसका दुरुपयोग करता था, और उन्हीं आईडी के जरिए फर्जी प्रमाणपत्र जनरेट करता था। पुलिस के मुताबिक करीब डेढ़ साल के दौरान इस गिरोह ने हजारों फर्जी प्रमाणपत्र तैयार किए थे, जिनमें से जांच के दौरान 500 से ज्यादा प्रमाणपत्र बरामद भी हुए। एक चौंकाने वाला उदाहरण यह भी सामने आया कि एक प्रमाणपत्र महाराष्ट्र से जारी किया गया था, जबकि उसमें दर्ज माता-पिता का पता पश्चिम बंगाल का था — यानी गिरोह पूरे देश में फैला हुआ था। पुलिस को आशंका थी कि इन फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल आगे चलकर दूसरे सरकारी दस्तावेज बनवाने में भी किया जा सकता था।

माता-पिता की हत्या, 24 घंटे में खुलासा

दिसंबर 2025 में जौनपुर के जफराबाद थाना क्षेत्र के अहमदपुर गांव में एक बेहद संगीन मामला सामने आया। एक व्यक्ति, जिसका नाम अम्बेश बताया गया, पर अपने ही माता-पिता की हत्या का आरोप लगा। पुलिस जांच में सामने आया कि पारिवारिक और पैसों के विवाद के चलते अम्बेश ने 8 दिसंबर की रात अपने माता-पिता के सिर पर वार कर उनकी हत्या कर दी, और फिर शवों को बोरों में भरकर गोमती नदी में फेंक दिया।

जब परिवार की तरफ से गुमशुदगी की सूचना मिली, तो एएसपी सिटी आयुष श्रीवास्तव के नेतृत्व में पुलिस टीम ने तुरंत जांच शुरू की। पूछताछ में अम्बेश ने अपना जुर्म कबूल कर लिया, जिसके बाद उसकी निशानदेही पर गोमती नदी में शवों की तलाश के लिए सर्च ऑपरेशन चलाया गया। पुलिस ने यह पूरा मामला महज 24 घंटे के भीतर सुलझा लिया, जिसे उनके कार्यकाल की एक बड़ी उपलब्धि माना गया।

उन्नाव में नयी पारी की शुरुवात, गुनाहों के शहर युवा पुलिस अधीक्षक की परीक्षा!

अब जौनपुर से मिली इस पहचान के साथ आयुष श्रीवास्तव उन्नाव पहुंचे हैं, जहां चुनौतियां कहीं ज्यादा बड़ी और पुरानी हैं — संगठित गौ तस्करी नेटवर्क, साइबर ठगी, महिलाओं-बच्चों से जुड़े अपराध और हत्या-लूट जैसे मामले। जौनपुर में जिस तरह उन्होंने संगठित गिरोहों और संवेदनशील मामलों को तेजी से सुलझाया, उससे स्थानीय लोगों में एक उम्मीद जरूर बंधी है, लेकिन उन्नाव का अपराध ढांचा जौनपुर से कहीं ज्यादा जड़ जमाए बैठा है। असली परीक्षा अब यहीं से शुरू होगी।

Prashant Tiwari

प्रशांत तिवारी एक अनुभवी ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट, क्राइम इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर और डिजिटल मीडिया स्ट्रैटेजिस्ट हैं। उन्होंने डीडी न्यूज़ (दूरदर्शन) में बतौर डिजिटल हेड की सेवाएं दीं और प्राइम टीवी में डिजिटल मार्केटिंग मैनेजर के रूप में न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स की डिजिटल ग्रोथ, ऑडियंस एंगेजमेंट और मल्टी-प्लेटफॉर्म मीडिया स्ट्रैटेजी पर महत्वपूर्ण काम किया। क्राइम इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर उन्होंने कई न्यूज़ चैनलों के लिए अंडरकवर/स्पाई-स्टाइल रिपोर्टिंग, स्टिंग ऑपरेशन और फील्ड इन्वेस्टिगेशन किए। संगठित अपराध, साइबर क्राइम, ड्रग्स सिंडिकेट, मानव एवं गौवंश तस्करी और फर्जीवाड़े जैसे विषयों पर उनकी इन्वेस्टिगेशन चर्चित रहीं। कई संवेदनशील मामलों में उन्होंने क्षेत्रीय पुलिस को जरूरी इनपुट व सहयोग उपलब्ध कराया।

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