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पत्रकार वो नहीं जिसके गले में कार्ड, पत्रकार वो है जो मैदान में खून-पसीना बहाता है

लेख: डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार

आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो गया है। बाजार में 500 से 2000 रुपये दो और प्रेस का आई-कार्ड छपवा लो। नाम के आगे “पत्रकार” लिख लो। लेकिन इससे कोई पत्रकार नहीं बन जाता।

आई-कार्ड प्लास्टिक का टुकड़ा है। पत्रकारिता जिगर का मामला है।

सोशल मीडिया पर दो पोस्ट डाल देना, किसी उद्घाटन में फोटो खिंचवा लेना और खुद को चौथा स्तंभ बता देना अब फैशन बन गया है। लेकिन जब शहर में कोई वारदात होती है, सड़क पर खून बहता है, रात में आग लगती है या जनता सड़क पर उतरती है, तब ये ‘कार्डधारी’ गायब मिलते हैं।

उस वक्त मैदान में वही दिखता है जो 45 डिग्री की धूप में दौड़ रहा है, मूसलाधार बारिश में भीगकर खबर ला रहा है, आधी रात को फोन की घंटी पर उठकर निकल पड़ता है। जिसे त्योहार, शादी, बीमारी कुछ नहीं दिखता। खबर पुकारे और वो चल दे।

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एक सच्चे पत्रकार की जिंदगी आराम की नहीं। परिवार को वक्त नहीं दे पाता। पुलिस की लाठी, अपराधी की धमकी, भीड़ का गुस्सा सब झेलकर सच को कैमरे और कलम में कैद करता है। अखबार में 8 कॉलम की खबर और टीवी पर 2 मिनट की रिपोर्ट के पीछे उसकी 12 घंटे की भागदौड़ छिपी होती है।

सबसे दुखद यह है कि कुछ लोग कार्ड का इस्तेमाल रुतबा और वसूली के लिए करते हैं। उनकी वजह से मेहनत करने वालों की साख पर भी बट्टा लगता है।

समझ लीजिए – प्रेस कार्ड खरीदना आसान है, जनता का भरोसा जीतना मुश्किल। पत्रकारिता कोई धंधा नहीं, लोकतंत्र की जिम्मेदारी है। सच्चा पत्रकार सत्ता से सवाल करता है, जनता की चीख को माइक देता है और सच के लिए जेल जाने से भी नहीं डरता।

उसकी पहचान कार्ड से नहीं होती। उसकी पहचान उसकी निडर कलम, मेहनत और उस हौसले से होती है जिससे वो सच के सामने खड़ा हो जाता है।

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