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रक्षा उत्पादन की छलांग के बाद असली सवाल – क्या भारत तकनीक का भी मालिक बन रहा है?

SAT-SAAW से लेकर ₹1.78 लाख करोड़ के रक्षा उत्पादन तक भारत ने लंबी दूरी तय की है, लेकिन आत्मनिर्भरता की अगली परीक्षा उत्पादन नहीं, निर्णायक तकनीकों पर नियंत्रण की है

लेखक – राकेश मिश्रा

23 सितंबर 2026 को रक्षा क्षेत्र से आई एक खबर को सामान्य रक्षा खरीद की तरह पढ़ना आसान है। रक्षा मंत्रालय ने भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के साथ भारतीय वायुसेना के लिए 160 Satellite Smart Anti-Airfield Weapons यानी SAT-SAAW की खरीद का ₹810.79 करोड़ का अनुबंध किया। यह अनुबंध Buy (Indian–Indigenously Designed, Developed and Manufactured) श्रेणी के अंतर्गत है। इस प्रणाली को DRDO ने डिजाइन और विकसित किया है और इसमें 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का प्रावधान है। इसके साथ Initial Measurement Unit, Long Impact Delay Fuse और Twin Store Carrier जैसे उप-तंत्रों के स्वदेशीकरण की दिशा में भी आगे बढ़ने की बात कही गई है। इसकी आपूर्ति 2027-28 और 2028-29 में निर्धारित है।

लेकिन इस खबर का वास्तविक महत्व 160 हथियारों या ₹810 करोड़ में नहीं है। इसका महत्व उस दिशा में है, जिस दिशा में भारत का रक्षा उद्योग बढ़ रहा है। सवाल यह है कि क्या भारत केवल हथियारों का उत्पादन बढ़ा रहा है या धीरे-धीरे उन मूल तकनीकों पर भी अपना अधिकार स्थापित कर रहा है जिन पर भविष्य की सैन्य शक्ति निर्भर करेगी?

भारत का वार्षिक रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह 2024-25 के ₹1.54 लाख करोड़ की तुलना में 15.6 प्रतिशत अधिक है और 2020-21 के ₹84,643 करोड़ से लगभग 110 प्रतिशत अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 76 प्रतिशत और निजी क्षेत्र की 24 प्रतिशत रही। निजी क्षेत्र का उत्पादन लगभग ₹42,000 करोड़ रहा।

रक्षा निर्यात में भी तेज वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के ₹23,622 करोड़ से 62.66 प्रतिशत अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। इन आंकड़ों का महत्व कम करके नहीं आंका जा सकता। भारत के रक्षा औद्योगिक आधार में बदलाव दिखाई दे रहा है। लेकिन आंकड़ों की दूसरी परत को देखना भी उतना ही आवश्यक है। उत्पादन बढ़ना और तकनीकी स्वायत्तता बढ़ना हमेशा एक ही बात नहीं होती।

‘ भारत में बना’ और ‘भारत ने बनाया’ में अंतर- किसी रक्षा प्रणाली के भारत में निर्मित होने के कई अर्थ हो सकते हैं। उसकी असेंबली भारत में हो सकती है। उसके कुछ प्रमुख हिस्से भारत में बन सकते हैं। उसका डिजाइन भारत में विकसित हो सकता है और अंततः उसकी मूल तकनीक, बौद्धिक संपदा और भविष्य के अपग्रेड पर भी भारत का नियंत्रण हो सकता है। ये चारों अलग-अलग स्तर हैं।

इसलिए रक्षा आत्मनिर्भरता का अगला प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितना उत्पादन भारत में हुआ, बल्कि यह होना चाहिए, उस उत्पादन में भारतीय डिजाइन का कितना हिस्सा है? महत्वपूर्ण तकनीक किसके नियंत्रण में है? Critical Components कहां से आते हैं? सॉफ्टवेयर और इलेक्ट्रॉनिक्स पर किसका नियंत्रण है? और यदि किसी संकट में विदेशी सप्लाई रुक जाए तो भारत कितने समय तक उस प्रणाली को चला और उन्नत कर सकता है? यही वे प्रश्न हैं जो किसी देश की वास्तविक रक्षा आत्मनिर्भरता को परिभाषित करते हैं।

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SAT-SAAW इस बदलाव का एक उपयोगी उदाहरण है

यह हवा से जमीन पर मार करने वाला precision-guided glide weapon है, जिसे Jaguar, Hawk और Su-30MKI जैसे प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। सरकारी जानकारी के अनुसार इसे DRDO ने स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित किया है और वर्तमान अनुबंध में 60 प्रतिशत indigenous content रखा गया है। साथ ही कुछ उप-तंत्रों को और अधिक स्वदेशी बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। स्वदेशीकरण कोई अंतिम स्थिति नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है। आज यदि किसी प्रणाली में 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री है तो अगला सवाल होना चाहिए कि शेष महत्वपूर्ण हिस्सों में से कौन से हिस्से रणनीतिक रूप से संवेदनशील हैं और उनका स्वदेशी विकल्प कितनी जल्दी विकसित किया जा सकता है। और उससे भी आगे क्या स्वदेशी सामग्री बढ़ने के साथ भारतीय design capability और intellectual property भी बढ़ रही है? यही तकनीकी आत्मनिर्भरता की गहराई तय करेगा।

युद्ध का चरित्र बदल रहा है

भविष्य का युद्ध केवल टैंक, विमान, मिसाइल और युद्धपोतों का युद्ध नहीं होगा। युद्धक्षेत्र में सेंसर उतने ही महत्वपूर्ण होंगे जितने हथियार। सुरक्षित संचार उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना प्लेटफॉर्म। डेटा उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना गोला-बारूद और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियां, साइबर क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन, एंटी-ड्रोन तकनीक, सैटेलाइट निगरानी, उन्नत रडार, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर भविष्य की सैन्य क्षमता के महत्वपूर्ण आधार बनेंगे।

इसका अर्थ यह है कि अगली रक्षा क्रांति शायद किसी एक बड़े हथियार से नहीं आएगी। वह आएगी सैकड़ों महत्वपूर्ण तकनीकों के एक साथ जुड़ने से। इसलिए रक्षा आत्मनिर्भरता का अर्थ भी बदलना होगा।

Critical Components: सबसे छोटी कड़ी, सबसे बड़ा जोखिम

किसी आधुनिक हथियार प्रणाली को एक विशाल मशीन की तरह समझा जा सकता है। यदि उसका सबसे महत्वपूर्ण छोटा कंपोनेंट उपलब्ध नहीं है, तो पूरी प्रणाली प्रभावित हो सकती है। एक इंजन, एक सेंसर, एक रडार मॉड्यूल, एक माइक्रोचिप, एक सुरक्षित संचार प्रणाली, एक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर मॉड्यूल, एक विशेष मिश्रधातु, एक इमेजिंग सिस्टम। इनमें से कोई एक तकनीक युद्धकाल में उपलब्ध न हो तो पूरा प्लेटफॉर्म प्रभावित हो सकता है। इसलिए भारत के लिए अगला लक्ष्य केवल Platform Sovereignty नहीं होना चाहिए। उसे Component Sovereignty की दिशा में भी बढ़ना होगा। रक्षा उत्पादन की गति तभी टिकाऊ होगी जब उसके पीछे पर्याप्त शोध और विकास क्षमता हो।

PRS के 2026-27 के रक्षा बजट विश्लेषण के अनुसार रक्षा मंत्रालय के लिए ₹7,84,678 करोड़ का प्रावधान है। इसमें पूंजीगत व्यय ₹2,31,010 करोड़ है। पूंजीगत व्यय के भीतर Research & Development की हिस्सेदारी लगभग 7 प्रतिशत है। PRS ने रक्षा क्षेत्र की चुनौतियों में उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण की सीमित उपस्थिति और R&D में कमी को भी रेखांकित किया है।

यह आंकड़ा भारत की वैज्ञानिक क्षमता का मूल्यांकन नहीं है। भारत ने मिसाइल, अंतरिक्ष, परमाणु विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमता विकसित की है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या रक्षा R&D की गति भविष्य के युद्धक्षेत्र में तकनीकी बदलाव की गति के बराबर है? यदि नहीं, तो उत्पादन में हुई प्रगति को तकनीकी श्रेष्ठता में बदलना कठिन होगा।

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भारत को रक्षा अनुसंधान को एक सतत चक्र में बदलना होगा— Research → Prototype → Testing → User Feedback → Production → Export → Upgrade

यदि प्रयोगशाला में विकसित तकनीक वर्षों तक परीक्षण और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अटकी रहती है, तो उसकी सामरिक उपयोगिता कम हो सकती है। दूसरी ओर, यदि सेना, उद्योग, स्टार्टअप, विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान एक साथ काम करते हैं, तो तकनीक तेजी से उपयोगी उत्पाद में बदल सकती है। यहीं निजी क्षेत्र और MSME की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। भविष्य की रक्षा अर्थव्यवस्था में केवल कुछ बड़ी कंपनियां पर्याप्त नहीं होंगी। हजारों छोटे और मध्यम तकनीकी उद्यमों की आवश्यकता होगी, जो सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, ड्रोन, संचार प्रणाली, सामग्री और दूसरे महत्वपूर्ण घटक विकसित कर सकें।

रक्षा निर्यात : केवल व्यापार नहीं, तकनीकी परीक्षा 

₹38,424 करोड़ का रक्षा निर्यात भारत के बढ़ते औद्योगिक आधार का महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन अगला सवाल निर्यात की मात्रा से अधिक उसकी प्रकृति का होना चाहिए। भारत दुनिया को क्या बेच रहा है? क्या वह केवल उपकरण और उप-प्रणालियां बेच रहा है या भविष्य में ऐसे पूर्ण रक्षा सिस्टम, सेंसर, मिसाइल, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और सॉफ्टवेयर भी निर्यात करेगा जिनकी मूल तकनीक भारत के पास होगी?

यदि भारत वैश्विक बाजार में केवल निर्माता नहीं बल्कि Technology Supplier बनता है, तो रक्षा निर्यात का रणनीतिक महत्व कई गुना बढ़ सकता है। इसलिए रक्षा निर्यात को केवल विदेशी मुद्रा अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय तकनीक की वैश्विक परीक्षा के रूप में भी देखना चाहिए।

रत ने रक्षा उत्पादन में महत्वपूर्ण दूरी तय की है। ₹1.78 लाख करोड़ का उत्पादन और ₹38,424 करोड़ का निर्यात इसकी पुष्टि करते हैं। लेकिन अगला चरण अधिक कठिन है। अब प्रश्न उत्पादन की मात्रा का नहीं, तकनीकी स्वामित्व की गहराई का है।

भारत को यह पूछना होगा – हमने कितना बनाया के साथ हमने कितना डिजाइन किया, कितनी मूल तकनीक विकसित की, कितनी Intellectual Property भारत में पैदा हुई और सबसे महत्वपूर्ण क्या हम संकट की स्थिति में अपनी रक्षा प्रणालियों को बिना बाहरी तकनीकी सहारे लंबे समय तक चला और उन्नत कर सकते हैं?

क्योंकि आधुनिक युद्ध में हथियार की शक्ति केवल उसके आकार या मारक क्षमता से तय नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति उस तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र में छिपी होती है, जो उसे बनाता है, चलाता है और अगली पीढ़ी के लिए लगातार बेहतर करता है।

भारत के लिए रक्षा आत्मनिर्भरता की अगली मंजिल उत्पादन नहीं—तकनीकी स्वामित्व है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार है।)

Amresh Dwivedi

अमरेश द्विवेदी देश की एकमात्र बहुभाषी न्यूज़ एजेंसी हिंदुस्थान समाचार में कार्यरत हैं। इसके अलावा हिंदुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका युगवार्ता और मासिक पत्रिका नवोत्थान के साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी उनके आलेख छपते रहते हैं।

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