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अरुणाचल प्रदेश की बौद्ध विरासत और जनजातीय संस्कृति का अनूठा संगम, प्रदर्शनी में दिखेगी हिमालय की सांस्कृतिक यात्रा

अरुणाचल प्रदेश की बौद्ध विरासत, मोनपा छाम मुखौटों, डोनी-पोलो आस्था और ताई-खामती संस्कृति को प्रदर्शित करेगी Crossroads of Dharma प्रदर्शनी।

नई दिल्ली/अरुणाचल प्रदेश : अरुणाचल प्रदेश की समृद्ध बौद्ध विरासत, प्राचीन भारतीय दर्शन और स्थानीय जनजातीय परंपराओं को एक मंच पर प्रस्तुत करने के उद्देश्य से ‘Crossroads of Dharma’ प्रदर्शनी एक अनूठी सांस्कृतिक यात्रा का अनुभव कराएगी। इस प्रदर्शनी में बौद्ध धर्म की प्राचीन कलात्मक एवं दार्शनिक परंपराओं के साथ पूर्वी हिमालय की जीवंत सांस्कृतिक विरासत, लोक आस्थाओं और आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को प्रदर्शित किया जाएगा।

पूर्वी हिमालय के प्रवेश द्वार पर स्थित अरुणाचल प्रदेश सदियों से व्यापार, तीर्थयात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां बौद्ध दर्शन, स्थानीय पारिस्थितिकी और विभिन्न जनजातीय समुदायों की जीवनशैली ने मिलकर एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान विकसित की है। प्रदर्शनी इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समन्वय को तीन प्रमुख विषयों के माध्यम से सामने लाएगी।

प्रदर्शनी का पहला भाग ‘Signs, Symbols and Steles’ भगवान गौतम बुद्ध के जीवन, उपदेशों और बौद्ध दर्शन के दृश्यात्मक विकास पर केंद्रित है। इसमें सांची, भरहुत और गांधार की प्राचीन मूर्तिकला परंपराओं से लेकर पाल-सेन काल (8वीं से 12वीं शताब्दी) की कलाकृतियों तक की ऐतिहासिक यात्रा को समझाया जाएगा।

बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं, जातक कथाओं और बौद्ध सिद्धांतों को दर्शाने वाली मूर्तियों एवं शिल्पों के माध्यम से बताया जाएगा कि किस प्रकार प्राचीन भारतीय कलाकारों ने मौखिक उपदेशों को दृश्य भाषा में परिवर्तित किया। भूमि स्पर्श मुद्रा और धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा जैसे प्रतीकों के जरिए बौद्ध दर्शन की गहरी अवधारणाओं को सरल रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।

प्रदर्शनी का दूसरा भाग ‘Buddhist Legacies and the Dual Heritage’ अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध धर्म के दो प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक मार्गों को रेखांकित करेगा।

पश्चिमी अरुणाचल के तवांग और पश्चिम कामेंग क्षेत्रों में मोनपा एवं शेरदुकपेन समुदायों के बीच महायान और वज्रयान बौद्ध परंपराओं का प्रभाव देखने को मिलता है। तवांग मठ और 18वीं शताब्दी का गोरसम स्तूप इस विरासत के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।

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वहीं पूर्वी अरुणाचल के नामसाई और चांगलांग क्षेत्रों में ताई-खामती और सिंगफो समुदायों ने थेरवाद बौद्ध परंपरा को संरक्षित रखा है। यहां सुनहरे रंग के लकड़ी के पैगोडा, कांस्य बुद्ध प्रतिमाएं और पारंपरिक धार्मिक स्थापत्य इस सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं।

प्रदर्शनी में गुरु पद्मसंभव की आध्यात्मिक परंपरा, पंचम दलाई लामा द्वारा तवांग मठ की स्थापना को मिले संरक्षण और छठे दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो के तवांग स्थित उर्गेलिंग मठ में जन्म से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों को भी प्रमुखता दी जाएगी।

तीसरा भाग ‘Indigenous Matrix and the Synthesis of Living Traditions’ स्थानीय जनजातीय ज्ञान, पारंपरिक शिल्प और धार्मिक मान्यताओं के बीच संबंधों को उजागर करेगा।

मोनपा समुदाय के पारंपरिक छाम नृत्य में इस्तेमाल होने वाले रंगीन मुखौटे, विशेष रूप से श्मशान भूमि के रक्षक माने जाने वाले ‘दुर दाग’ के मुखौटे, स्थानीय लकड़ी की शिल्पकला का उदाहरण हैं। दूसरी ओर, ताई-खामती और सिंगफो समुदायों की सैंकन परंपरा में प्रयुक्त ‘सैंकन क्यॉन्ग’ नामक जलधारा युक्त मंडप धार्मिक स्थापत्य और सामुदायिक उत्सव के अनूठे मेल को दर्शाता है।

प्रदर्शनी में ‘शुगु शेंग’ का विशेष उल्लेख होगा। यह स्थानीय डैफनी पौधे से तैयार किया जाने वाला टिकाऊ और कीटरोधी कागज है, जिसका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से बौद्ध धर्मग्रंथों और तिब्बती पांडुलिपियों के संरक्षण में किया जाता रहा है।

इसके साथ ही तानी जनजातीय समुदायों की ‘डोनी-पोलो’ आस्था को भी प्रदर्शित किया जाएगा। आदि, अपातानी, न्यिशी, गालो और तागिन समुदायों में प्रचलित इस आध्यात्मिक परंपरा में डोनी (सूर्य) और पोलो (चंद्रमा) को नैतिक व्यवस्था, ज्ञान और संरक्षण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

प्रदर्शनी में डोनी-पोलो की मान्यताओं और वज्रयान बौद्ध परंपरा के चंद्र-सौर प्रतीकों के बीच सांस्कृतिक एवं दार्शनिक समानताओं को भी रेखांकित किया जाएगा।

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इस प्रदर्शनी की एक महत्वपूर्ण विशेषता राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और इंडियन म्यूजियम, कोलकाता की बौद्ध विरासत से संबंधित संग्रहों का दस्तावेजीकरण और प्रस्तुतीकरण है। इसमें मूर्तियों और थांगका चित्रों की उत्कृष्ट प्रतिकृतियों के साथ संग्रहालयों में संरक्षित ऐतिहासिक धरोहरों की चयनित फोटोग्राफिक प्रस्तुतियां शामिल होंगी।

इसके अलावा शुगु शेंग पांडुलिपियों, मोनपा छाम मुखौटों और डोनी-पोलो से जुड़े धार्मिक स्थलों के माध्यम से यह दिखाया जाएगा कि प्राचीन परंपराएं केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आज भी स्थानीय समुदायों के दैनिक जीवन और धार्मिक गतिविधियों का हिस्सा हैं।

प्रदर्शनी में क्षेत्रीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और मानवशास्त्रीय शोध को विशेष महत्व दिया गया है। इसके लिए अरुणाचल प्रदेश की संस्था RIWATCH (Research Institute of World’s Ancient Traditions Cultures and Heritage) तथा नामसाई जिले के चोंगखाम स्थित Tai Khampti Singpho Museum-cum-Research Centre के साथ सहयोग को महत्व दिया गया है।

मौखिक इतिहास, स्थानीय लोककथाओं, पारंपरिक अनुष्ठानों और समुदायों के अनुभवों के जरिए प्रदर्शनी यह समझाने का प्रयास करेगी कि किस प्रकार धार्मिक परंपराएं, प्रकृति और स्थानीय संस्कृति एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।

कुल मिलाकर, ‘Crossroads of Dharma’ अरुणाचल प्रदेश को केवल एक सीमावर्ती भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि बौद्ध दर्शन, जनजातीय ज्ञान, प्राकृतिक विरासत और जीवंत आध्यात्मिक परंपराओं के संगम के रूप में प्रस्तुत करती है। यह प्रदर्शनी दर्शाती है कि यहां की सांस्कृतिक स्मृतियां केवल ऐतिहासिक स्मारकों में नहीं, बल्कि समुदायों के अनुष्ठानों, हस्तशिल्प, लोककथाओं और पीढ़ियों से चली आ रही आस्थाओं में आज भी जीवित हैं।

Amresh Dwivedi

अमरेश द्विवेदी देश की एकमात्र बहुभाषी न्यूज़ एजेंसी हिंदुस्थान समाचार में कार्यरत हैं। इसके अलावा हिंदुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका युगवार्ता और मासिक पत्रिका नवोत्थान के साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी उनके आलेख छपते रहते हैं।

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