बच्चों के गायब होने की वजह भी खोज रहे हैं?
बांग्लादेश में सात महीनों में 15,717 बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट ने उठाए सवाल. भारत में भी हर साल हजारों बच्चे होते हैं लापता.


सितंबर 2026 में बांग्लादेश पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से जुलाई के बीच वहां 15,717 बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई। इनमें 13,679 बच्चे बरामद हुए या परिवारों तक लौटे, जबकि 2,038 बच्चे अब भी अनट्रेस्ड थे। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लापता बच्चों की संख्या बताने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती क्योंकि बड़ी संख्या में बच्चे बाद में मिल जाते हैं।
बांग्लादेश का यह आंकड़ा भारत की स्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। दोनों देशों की जनसंख्या, प्रशासनिक व्यवस्था और रिपोर्टिंग प्रणाली अलग है। लेकिन यह आंकड़ा एक ऐसा सवाल जरूर खड़ा करता है, जो भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है- जब कोई बच्चा लापता होता है तो क्या हमारी व्यवस्था सिर्फ उसे खोजती है या उसके गायब होने के कारण और परिस्थितियों की भी व्यवस्थित पड़ताल करती है?
भारत में बच्चों के लापता होने की समस्या नई नहीं है और इसके लिए सरकारी रिकॉर्ड भी उपलब्ध हैं। गृह मंत्रालय द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में देश में 83,350 बच्चे लापता दर्ज हुए। इनमें पिछले वर्षों से चले आ रहे मामलों को जोड़ने पर कुल 1,27,874 बच्चों के मामले रिकॉर्ड में थे। उसी वर्ष 80,561 बच्चों को ट्रेस या रिकवर किया गया, जबकि वर्ष के अंत में 47,313 बच्चे अनरिकवर्ड/ अनट्रेस्ड थे। यहां आंकड़ों को समझना जरूरी है। 1,27,874 का आंकड़ा केवल 2022 में गायब हुए बच्चों का नहीं है। इसमें पिछले वर्षों के ऐसे मामले भी शामिल हैं, जो 2022 की शुरुआत तक अनट्रेस्ड थे।
यही अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। लापता, पता लगा और पता नहीं चला – तीनों अलग-अलग श्रेणियां हैं।
उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में 2022 में 12,455 बच्चे लापता दर्ज हुए। पिछले वर्षों के अनट्रेस्ड मामलों को जोड़ने पर कुल संख्या 19,540 थी। वर्ष के दौरान 12,546 बच्चों को ट्रेस किया गया और वर्ष के अंत में 6,994 बच्चे अनरिकवर्ड/अनट्रेस्ड थे। इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि सभी या बड़ी संख्या में लापता बच्चे मानव तस्करी के शिकार हुए। लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि समस्या का पैमाना इतना बड़ा है कि प्रत्येक मामले में जोखिम की पहचान और समयबद्ध जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने लापता बच्चों को खोजने और उनकी सुरक्षा के लिए पिछले वर्षों में कई संस्थागत और डिजिटल व्यवस्थाएं विकसित की हैं।
गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को लापता बच्चों के मामलों में कार्रवाई के लिए कई एडवाइजरी जारी की हैं। इनमें 2013 की वह एडवाइजरी भी शामिल है, जिसका स्पष्ट उद्देश्य लापता बच्चों को ट्रेस करना और मानव तस्करी को रोकने के उपाय करना था। बाद में भी बच्चों के अपहरण, किशोरियों की गुमशुदगी और बाल अपराध से जुड़े मामलों पर अलग-अलग दिशा-निर्देश जारी किए गए। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के स्तर पर ट्रैकचाइल्ड जैसी व्यवस्था लंबे समय से लापता और बरामद बच्चों की जानकारी को जोड़ने का काम करती रही है।
अब व्यवस्था को और आगे बढ़ाते हुए जुलाई 2026 में ट्रैकचाइल्ड और खोया-पाया को यूनिफाइड मिशन वात्सल्य पोर्टल में एकीकृत किया गया है। इस पोर्टल को सीसीटीएनएस से भी जोड़ा गया है, जिससे लापता बच्चों से संबंधित एफआईआर और मिशन वात्सल्य के रिकॉर्ड के बीच डेटा मिलान संभव हो सके। इसमें गृह मंत्रालय, रेलवे, राज्य सरकारों, बाल कल्याण समिति, किशोर न्याय बोर्ड और अन्य संस्थाओं की भागीदारी है। राज्यों और जिलों में गुम बच्चाें के लिए नोडल अधिकारियों की व्यवस्था भी की गई है। अर्थात आज भारत के पास कानून भी है, डिजिटल प्लेटफॉर्म भी और संस्थागत तंत्र भी।
अब सवाल यह है कि इन व्यवस्थाओं का इस्तेमाल केवल बच्चे को खोजने तक सीमित है या इससे आगे भी जाता है? गुमशुदगी और तस्करी- दोनों को एक मानना सबसे बड़ी गलती होगी। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। हर लापता बच्चा मानव तस्करी का शिकार नहीं होता। बच्चे परिवार से नाराज होकर घर छोड़ सकते हैं, रास्ता भटक सकते हैं, किसी परिचित के साथ जा सकते हैं या कई अन्य कारणों से लापता हो सकते हैं। दूसरी ओर, मानव तस्करी एक अलग अपराध है, जिसमें शोषण के उद्देश्य से किसी व्यक्ति की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, आश्रय या प्राप्ति जैसी परिस्थितियां शामिल होती हैं।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 143 में तस्करी को शोषण के उद्देश्य से भर्ती, परिवहन, आश्रय, स्थानांतरण या प्राप्ति से संबंधित अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है। बच्चे की तस्करी के मामले में कानून में कठोर सजा का प्रावधान है।
इसलिए केवल ग़ुम बच्चे के आंकड़े को तस्करी के आंकड़े से जोड़ देना गलत होगा। इससे एक और महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है- जो बच्चे लापता हुए और बाद में मिले, उनमें से कितने मामलों में जांच के दौरान तस्करी या शोषण का कोण सामने आया? यही वह सवाल है जिसका राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट और नियमित सार्वजनिक डेटा होना नीति और जांच-दोनों के लिए उपयोगी होगा।
गृह मंत्रालय की एडवाइजरी में लापता बच्चों की जानकारी को डिजिटल रूप से दर्ज करने और संबंधित सूचनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर साझा करने की दिशा में राज्यों को निर्देश दिए गए हैं। इसका उद्देश्य केवल रिकॉर्ड बनाना नहीं, बल्कि बच्चों को ट्रेस करने और संभावित तस्करी को रोकने के लिए सूचना का उपयोग करना भी है।
आज मिशन वात्सल्य पोर्टल और सीसीटीएनएसके बीच डेटा इंटरऑपरेबिलिटी की व्यवस्था भी बनाई गई है। सरकार के अनुसार इससे लापता बच्चों से संबंधित एफआईआर और मिशन वात्सल्यके डेटाबेस के बीच मिलान कर बच्चों को ट्रेस करने में मदद मिल सकती है। इस व्यवस्था के सामने अब असली चुनौती तकनीक उपलब्ध कराने से आगे की है- क्या उपलब्ध जानकारी का विश्लेषण करके जोखिम के पैटर्न भी पहचाने जा रहे हैं?
भारत में मानव तस्करी के मामलों में भी सरकारी कार्रवाई के आंकड़े उपलब्ध हैं। गृह मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2022 के बीच 18 वर्ष से कम आयु के जिन तस्करी पीड़ितको बचाया गया, उनकी संख्या क्रमशः 2,484, 2,746, 2,151, 2,691 और 3,098 रही। ये आंकड़े ‘18 साल से कम उम्र के तस्करी के शिकार लोगों को बचाया गया’ की श्रेणी के हैं; इन्हें उस वर्ष के गुमशुदा बच्चाें के आंकड़ों के साथ सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा।
यही अंतर एक गंभीर डेटा प्रश्न की ओर इशारा करता है। एक तरफ हजारों बच्चे गुमशुदामें दर्ज होते हैं। दूसरी तरफ तस्करी पीड़ित के अलग आंकड़े हैं। लेकिन सार्वजनिक विमर्श में इनके बीच की कड़ी कितनी स्पष्ट है? गायब → पता लगाया गया→ दूसरे स्थान से बरामद → परिस्थितियों की जांच → तस्करी का तरीका → एफआईआर → चार्जशीट → पुनर्वास। यदि इस पूरी श्रृंखला का डेटा राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित रूप से सामने आए, तो तस्वीर कहीं अधिक स्पष्ट हो सकती है।
बच्चे का मिलना अंत नहीं, जांच का दूसरा चरण भी हैl किसी बच्चे की बरामदगी को सफलता के रूप में दर्ज करना स्वाभाविक है। लेकिन बाल संरक्षण की दृष्टि से कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। बच्चे की सुरक्षित वापसी, मानसिक और सामाजिक स्थिति, परिवार में पुनर्स्थापन, शिक्षा, परामर्श और भविष्य में दोबारा शोषण से सुरक्षा—ये सभी उसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
यही वजह है कि मिशन वात्सल्यका उद्देश्य केवल निगाह रखने तक सीमित नहीं है। सरकार के अनुसार इसका व्यापक उद्देश्य देखभाल, सुरक्षा, पुनर्वास और पुनः एकीकरण है। इसलिए किसी भी राष्ट्रीय समीक्षा में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कितने बच्चे मिले। यह भी देखना होगा कि वे किस स्थिति में मिले और उनके मिलने के बाद व्यवस्था ने उनके लिए क्या किया।
बांग्लादेश का आंकड़ा भारत के लिए चेतावनी नहीं, एक सवाल है-
लापता बच्चा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। उसके पीछे एक परिवार की बेचैनी, पुलिस की जिम्मेदारी और बाल सुरक्षा व्यवस्था की पूरी परीक्षा होती है। भारत ने कानून बनाए हैं, डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किए हैं और लापता बच्चों की तलाश के लिए संस्थागत तंत्र खड़ा किया है। अब अगला कदम यह सुनिश्चित करना है कि इन व्यवस्थाओं से मिलने वाली सूचनाएं केवल रिकॉर्ड बनकर न रह जाएं, बल्कि उनसे जोखिम, कारण और अपराध की कड़ियां भी पहचानी जाएं।
किसी बच्चे को खोज लेना जरूरी है। लेकिन यह जानना उससे कम जरूरी नहीं कि – वह गायब कैसे हुआ? कहां मिला? किसके साथ मिला और उसके गायब होने की असली वजह क्या थी? क्योंकि किसी बच्चे का मिल जाना परिवार के लिए राहत जरूर है, लेकिन उसके गायब होने की वजह सामने आना ही उस राहत को स्थायी सुरक्षा में बदल सकता है। और यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है – क्या भारत सिर्फ लापता बच्चों को खोज रहा है, या उनके गायब होने की वजह भी खोज रहा है?



