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जौनपुर: खाकी की ‘खौफनाक’ चुप्पी! दबंगों के रसूख के आगे ‘जीरो टॉलरेंस’ ढेर, बासगाँव में न्याय की हत्या की पटकथा तैयार?

जौनपुर। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा है कि सूबे में ‘रामराज’ है और अपराधी गले में तख्ती लटकाकर घूम रहे हैं, लेकिन जौनपुर के सरपतहाँ थाने की ‘खाकी’ शायद किसी और ही स्क्रिप्ट पर काम कर रही है। सरपतहाँ के बासगाँव से आई खबर योगी सरकार के दावों की न केवल धज्जियां उड़ा रही है, बल्कि यह भी बता रही है कि अगर आपके पास ‘ऊंचा रसूख’ है, तो कानून की धाराएं आपके घर की दासी बन सकती हैं।

रसूख का नंगा नाच: दामाद कमिश्नर, चाचा DIG और सिस्टम ‘नतमस्तक’

मामला पुश्तैनी जमीन के बंटवारे का है, लेकिन इसकी परतें किसी फिल्मी विलेन की साजिश से कम नहीं हैं। पीड़ित ऋषिकेश मिश्रा का आरोप है कि उसकी पुश्तैनी जमीन पर गिद्ध दृष्टि जमाए बैठा गौरीशंकर मिश्रा कोई साधारण दबंग नहीं है। चर्चा है कि इस खेल के असली खिलाड़ी पर्दे के पीछे बैठे वो सफेदपोश हैं जो ‘सिस्टम’ की चाबी घुमा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि गौरीशंकर के दामाद जीएसटी में असिस्टेंट कमिश्नर हैं और चाचा पुलिस महकमे में खुद DIG जैसे रसूखदार पद पर बैठे हैं। अब जब घर में ही ‘खाकी’ और ‘कलम’ की ताकत हो, तो भला पुलिस ऋषिकेश जैसे अकेले पड़ चुके युवक की क्यों सुने?

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थाने में घनघना रहे ‘सिफारिशी’ फोन: पीड़ित को ही मुजरिम बनाने की तैयारी?

सूत्रों की मानें तो सरपतहाँ थाने के फोन आजकल ‘ऊपर’ से आने वाले आदेशों से गरम हैं। आरोप है कि गौरीशंकर मिश्रा खुद थाने में बैठकर पुलिस पर इस कदर दबाव बना रहा है कि पीड़ित ऋषिकेश के खिलाफ ही फर्जी मुकदमा दर्ज कर दिया जाए। जिस युवक के पिता मुंबई में बीमार दादा की सेवा कर रहे हों और जो घर पर अकेला हो, उस पर सामूहिक मानसिक हमला यह बताने के लिए काफी है कि रसूखदारों के लिए ‘नैतिकता’ शब्द के कोई मायने नहीं हैं।

क्या कॉल रिकॉर्ड खंगालेगा शासन?

सवाल सीधा है—क्या जौनपुर पुलिस अब संविधान के बजाय ‘जीएसटी कमिश्नर’ और ‘डीआईजी’ की सिफारिशों पर चलेगी? क्या उत्तर प्रदेश का गृह विभाग उन कॉल रिकॉर्ड्स की जांच करेगा, जिन्होंने एक पीड़ित को ही मुजरिम बनाने की स्क्रिप्ट लिखी है? अगर योगी सरकार की ‘विजिलेंस’ टीम इन रसूखदारों की नकेल नहीं कसती, तो आम आदमी का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठना तय है।

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सिस्टम का ‘अंधापन’ और ऋषिकेश का अकेलापन

बासगाँव की यह घटना समाज के नैतिक पतन का आईना है। एक तरफ लकवाग्रस्त बुजुर्ग बिस्तर पर है, दूसरी तरफ रोजी-रोटी के लिए पिता घर से दूर है और बीच में खड़ा है वो पीड़ित जो अपनी जमीन बचाने के लिए सिस्टम की चौखट पर सर पटक रहा है। अब देखना यह है कि जौनपुर के आला अधिकारी इस मामले में ‘सफेदपोशों’ की फाइल तले दब जाते हैं या फिर ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर मुख्यमंत्री के इकबाल को बचाते हैं।

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