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लीगल कॉन्क्लेव 2026: 6 करोड़ लंबित मामलों के समाधान के लिए AI और मध्यस्थता पर जोर

अमरेश द्विवेदी, विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। “सभी के लिए सुलभ और किफायती न्याय” थीम पर आयोजित लीगल कॉन्क्लेव एंड अवॉर्ड्स 2026 में देश के प्रमुख विधि विशेषज्ञों ने न्याय प्रणाली में सुधार के लिए मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन), तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को महत्वपूर्ण साधन बताया। Society of Indian Law Firms और Society of Legal Professionals के संयुक्त आयोजन में यह बात प्रमुख रूप से सामने आई कि भारत में लंबित 6 करोड़ से अधिक मामलों के निपटारे के लिए नई तकनीकों का उपयोग जरूरी है, लेकिन इसके साथ संतुलन भी बनाए रखना होगा।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश Justice Manmohan ने कहा कि न्याय प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए “स्वस्थ बहस और रचनात्मक आलोचना” बेहद जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कमियों की ओर ध्यान दिलाना निंदा नहीं, बल्कि सुधार की दिशा में एक कदम है। उन्होंने तकनीक को “दोधारी तलवार” बताते हुए कहा कि इसका उपयोग सोच-समझकर किया जाना चाहिए और इसे केवल सहायक के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

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न्यायमूर्ति मनमोहन ने लंबित मामलों की गंभीर समस्या पर भी चिंता जताई और कहा कि यह समय है जब कानूनी समुदाय को यह सोचने की जरूरत है कि क्या मध्यस्थता प्रणाली, जो कभी समाधान मानी जाती थी, अब खुद एक चुनौती बन रही है। हालांकि उन्होंने पारिवारिक विवादों में मध्यस्थता की सफलता को रेखांकित करते हुए इसके व्यापक उपयोग की संभावनाओं को भी महत्वपूर्ण बताया।

सम्मानित अतिथि और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल Chetan Sharma ने कहा कि तकनीक और मध्यस्थता न्याय प्रणाली को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने कहा, “मध्यस्थता हमारे न्याय तंत्र का भविष्य है।” उनके अनुसार, AI और तकनीक के सही उपयोग से लाखों मामलों का तेजी से निपटारा किया जा सकता है, जिससे एक अधिक शांतिपूर्ण और संगठित समाज का निर्माण संभव होगा।

वहीं Lalit Bhasin ने विधि शिक्षा में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि लॉ स्कूलों को तकनीक के साथ संतुलन बनाकर छात्रों को प्रशिक्षित करना होगा। उन्होंने चिंता जताई कि युवा पीढ़ी तकनीक पर अत्यधिक निर्भर होती जा रही है, जिससे मानव बुद्धि का उपयोग कम हो रहा है। उन्होंने भारत में मजबूत आर्बिट्रेशन ढांचे की कमी की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसके कारण कई कॉर्पोरेट विवाद विदेशों में सुलझाए जाते हैं।

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डॉ. भसीन ने पारंपरिक पंचायत प्रणाली की ओर लौटने का भी सुझाव दिया, जहां सहमति आधारित समाधान को प्राथमिकता दी जाती थी। उन्होंने कहा कि कानून से आगे बढ़कर न्याय की व्यापक अवधारणा पर काम करने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने कानूनी क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी की सराहना करते हुए इसे “नारी शक्ति” का मजबूत उदाहरण बताया।

यह कॉन्क्लेव न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी, सुलभ और भविष्य के लिए तैयार बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक, मध्यस्थता और बेहतर विधि शिक्षा के जरिए भारत एक मजबूत और न्यायसंगत व्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ सकता है।

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