
नई दिल्ली : केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा है कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान परंपराएं और ऐतिहासिक विरासत देश की सभ्यतागत निरंतरता का आधार हैं। भारत केवल भौगोलिक सीमाओं में बंधा राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के ज्ञान, साधना, संघर्ष, संवाद और अनुभवों से निर्मित एक सांस्कृतिक राष्ट्र है।
यह बात उन्होंने नई दिल्ली में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सहयोग से प्रकाशित पुस्तक ‘Timeless India: Protection and Revival of Indian Cultural Identity Under the Leadership of Prime Minister Narendra Modi’ के विमोचन समारोह में कही। कार्यक्रम का आयोजन धरोहर भवन, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मंडी हाउस में किया गया।
पुस्तक का संपादन प्रख्यात पत्रकार और पूर्व राज्यसभा सांसद तरुण विजय ने किया है। इसका प्रकाशन IGNCA और सुभी पब्लिकेशंस द्वारा किया गया है। पुस्तक में भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण, ऐतिहासिक स्मारकों के पुनरुद्धार और राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्मृति को सहेजने जैसे विषयों पर चर्चा की गई है।
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना सदियों से निरंतर प्रवाहित होती रही है। भारत ने संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं के साथ संबंध स्थापित किए हैं। देश की ज्ञान परंपराओं, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत ने विश्वभर के लोगों को आकर्षित किया है।
उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीयों में अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं के प्रति गर्व की भावना को कमजोर करने के प्रयास हुए। इसका प्रभाव भारतीय ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक आदर्शों को देखने के नजरिये पर भी पड़ा।
शेखावत ने कहा कि भारतीय सभ्यता की विशेषता यह है कि वह भविष्य की ओर बढ़ते हुए भी अपने अतीत से प्रेरणा लेती है। भगवान राम और भगवान कृष्ण के आदर्शों के साथ ऋषियों, विचारकों और ज्ञान साधकों की परंपराएं आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करती हैं।
कार्यक्रम में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने पुस्तक की सराहना करते हुए इसके संपादक तरुण विजय के प्रयासों की प्रशंसा की। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और उसके पुनर्जीवन के महत्व को रेखांकित करने वाले इस प्रकाशन को महत्वपूर्ण पहल बताया।
कार्यक्रम में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने मुख्य भाषण दिया। सत्र की अध्यक्षता सांस्कृतिक विचारक डॉ. अनिल गोयल ने की।
डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति और उसकी कालातीत यात्रा को समझने के लिए सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता और गर्व की भावना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारतीय संस्कृति पर खुलकर चर्चा करने में अनावश्यक झिझक रही, जिसके कारण औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त होना कठिन बना रहा। उनके अनुसार, ‘टाइमलेस इंडिया’ जैसी पुस्तकें भारत की सांस्कृतिक निरंतरता और भारतीयता के मूल तत्वों को समझने का अवसर प्रदान करती हैं।
सहस्रबुद्धे ने यह भी कहा कि पुस्तकों का प्रकाशन और संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना भी उतना ही जरूरी है। भारतीय संस्कृति को केवल पुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा और दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित करने और भारतीय जीवन, परंपराओं तथा संस्कृति से संबंधित सामग्री विद्यार्थियों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने और भारतीय सांस्कृतिक यात्रा को उचित दृष्टिकोण से समझने की दिशा में प्रयास आवश्यक हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. अनिल गोयल ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक चेतना हजारों वर्षों से चली आ रही एक जीवंत परंपरा से निर्मित हुई है। अनेक ऐतिहासिक परिवर्तनों और आक्रमणों के बावजूद भारतीय संस्कृति की निरंतरता बनी रही है। उन्होंने कहा कि देश के मंदिर, स्तूप, किले, मूर्तियां और शिलालेख केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं हैं, बल्कि वे पूर्वजों के ज्ञान, कला, विज्ञान, आस्था और दर्शन के प्रमाण भी हैं।
गोयल ने कहा कि सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने, सभ्यतागत निरंतरता बनाए रखने और भावी पीढ़ियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर भारतीय इतिहास को समझने तथा भूली-बिसरी उपलब्धियों को सामने लाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, विकास और विरासत, आधुनिकता और परंपरा तथा विज्ञान और संस्कृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
पुस्तक ‘टाइमलेस इंडिया’ भारत की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने और उसे पुनर्जीवित करने में ऐतिहासिक स्मारकों की भूमिका का विश्लेषण करती है। इसमें विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों, स्थापत्य परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से भारत की सभ्यतागत निरंतरता को समझने का प्रयास किया गया है।
पुस्तक का एक प्रमुख विषय स्मारकों का संरक्षण और राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति को औपनिवेशिक दृष्टिकोण से मुक्त करने की आवश्यकता है। यह दृष्टिकोण भारतीय विरासत को देश के अपने ऐतिहासिक अनुभवों, परंपराओं और सांस्कृतिक नजरिये से समझने पर जोर देता है।
कार्यक्रम में विद्वानों, इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा इतिहास, पुरातत्व और सांस्कृतिक अध्ययन पर व्यापक संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया।
‘टाइमलेस इंडिया’ पुस्तक का विमोचन भारत की सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक स्मृति और स्मारक संरक्षण से जुड़े विमर्श को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण न केवल अतीत को समझने के लिए जरूरी है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए भी महत्वपूर्ण है।




