
नई दिल्ली : भारतीय नौसेना का तीन दिवसीय वार्षिक उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक सम्मेलन ‘इंडो-पैसिफिक रीजनल डायलॉग-2026’ (IPRD-2026) गुरुवार, 5 नवंबर को नई दिल्ली में संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सहयोग, महासागर शासन, समुद्री सुरक्षा और उभरती प्रौद्योगिकियों के जिम्मेदार उपयोग पर व्यापक चर्चा हुई। नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन (NMF) के सहयोग से आयोजित इस संवाद का मुख्य विषय ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक सहयोग’ रहा।
तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में पांच पेशेवर विषयगत सत्रों और वरिष्ठ स्तर की चर्चाओं के माध्यम से क्षेत्रीय समुद्री सहयोग को मजबूत बनाने के व्यावहारिक उपायों पर विचार-विमर्श किया गया। इसमें भारत सहित 20 देशों के 40 से अधिक विशेषज्ञों और प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भाग लिया।
सम्मेलन के अंतिम दिन की शुरुआत चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल एनएस राजा सुब्रमणि के विशेष संबोधन से हुई। इसके बाद उन्होंने प्रतिभागियों के साथ संवाद सत्र में हिस्सा लिया। इसके पश्चात ‘महासागर शासन और समुद्री सुदृढ़ता के लिए सहयोगात्मक दृष्टिकोण’ विषय पर महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किया गया। इसका संचालन यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक वाइस एडमिरल संजय जसजीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने किया।
इस सत्र में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने महासागर शासन, गहरे समुद्र में अनुसंधान, द्वीपीय देशों की आपदा से निपटने की क्षमता और समुद्री विज्ञान को जहाजरानी संचालन से जोड़ने जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे।
फिलीपींस विश्वविद्यालय की प्रोफेसर देवो फ्लोरेंस ओंडा ने महासागर शासन के क्षेत्र में फिलीपींस के अनुभव साझा किए। वहीं, अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण की पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ डॉ. मैरी बोरेल-मैककिनन ने गहरे समुद्र के अनुसंधान और संसाधनों के न्यायसंगत प्रबंधन पर चर्चा की।
आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के रामराज नरसिम्हन ने द्वीपीय देशों की आपदा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए संचालित IRIS कार्यक्रम की जानकारी दी। स्वीडन की फ्यूचर मैरीटाइम की सोफिया फर्स्टेनबर्ग-स्टॉट ने समुद्री विज्ञान और जहाजरानी संचालन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।
IPRD-2026 का अंतिम विषयगत सत्र ‘परिवर्तनकारी समुद्री प्रौद्योगिकियां और दोहरे उपयोग के निहितार्थ’ पर केंद्रित रहा। इसका संचालन भारतीय नौसेना के रियर एडमिरल गुनींदर सिंह जावांडा (सेवानिवृत्त) ने किया। इस सत्र में समुद्री क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम तकनीक और अन्य आधुनिक प्रौद्योगिकियों के उपयोग तथा उनके जिम्मेदार प्रबंधन पर चर्चा हुई।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS), जर्मनी की डोंगयून चो ने समुद्री क्षेत्र में एआई और क्वांटम तकनीकों के लिए हिंद-प्रशांत देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं पर विचार रखे। ब्रुसेल्स स्कूल ऑफ गवर्नेंस की डॉ. ईवा पेज़ोवा ने दोहरे उपयोग वाली समुद्री तकनीकों के जिम्मेदार प्रबंधन के लिए यूरोपीय संघ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बीच सहयोगात्मक तंत्र पर चर्चा की।
वहीं, दक्षिण अफ्रीकी नौसेना के पूर्व अधिकारी और स्टेलेनबॉश विश्वविद्यालय से जुड़े कैप्टन मार्क ब्लेन ने छोटी और मध्यम आकार की नौसेनाओं को आधुनिक तकनीकों के अनुरूप तैयार करने के लिए सहयोगात्मक रोडमैप पर विचार रखे। कमोडोर अरुण गोलाया (सेवानिवृत्त) ने नौसेनाओं के बीच परिचालन स्तर पर तकनीकी सहयोग की आवश्यकता बताई।
तीन दिवसीय सम्मेलन में सैन्य विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, समुद्री उद्योग के प्रतिनिधियों, राजनयिकों, शिक्षाविदों, मीडिया प्रतिनिधियों और विद्यार्थियों ने व्यापक भागीदारी की। सम्मेलन के दौरान समुद्री अनुसंधान में समान अवसर, तकनीकी क्षमता निर्माण, द्वीपीय देशों की आपदा से निपटने की तैयारी और समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाने जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया गया।
इस संवाद ने हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) के विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक सहयोग स्तंभ के अंतर्गत व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाने का रास्ता भी स्पष्ट किया। सम्मेलन का समापन भारत सरकार के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के समापन संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने तीन दिवसीय संवाद के दौरान हुई चर्चाओं और सहयोगात्मक प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया।
IPRD-2026 ने क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा, महासागर शासन और समुद्री सुदृढ़ता को मजबूत बनाने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया। साथ ही, इसने भारत के समुद्री विजन ‘महासागर’ (MAHASAGAR) यानी क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति को आगे बढ़ाने की दिशा में सहयोगात्मक दृष्टिकोण को मजबूती प्रदान की।



