राम मंदिर चंदे की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को Supreme Court से बड़ी राहत

अयोध्या राम मंदिर चंदे में कथित अनियमितताओं की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में दर्ज कथित रोड रेज मामले की एफआईआर में उनके खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक या कठोर कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने यह संरक्षण भविष्य में इसी मामले से जुड़ी संभावित एफआईआर तक भी बढ़ाया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए मामले में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
अदालत ने गाजियाबाद पुलिस को निर्देश दिया कि इंदिरापुरम थाने में दर्ज एफआईआर की प्रति अभिषेक उपाध्याय को उपलब्ध कराई जाए। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर मिलने के बाद पत्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं और कानून के तहत उचित राहत मांग सकते हैं। गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को एफआईआर की प्रति उपलब्ध कराने के संबंध में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया गया है।
क्या है पूरा मामला
अभिषेक उपाध्याय ने गाजियाबाद में दर्ज रोड रेज की एफआईआर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। यह एफआईआर 18 अगस्त को इंदिरापुरम थाने में दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। उपाध्याय का आरोप है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप गलत हैं और यह मामला उनकी पत्रकारिता से जुड़ी रिपोर्टिंग के बाद उन्हें परेशान करने के लिए दर्ज किया गया।
याचिका के मुताबिक, कथित घटना गाजियाबाद में शिप्रा मॉल के पास हुई थी। उपाध्याय का कहना है कि वह अपनी नाबालिग बेटी को स्कूल से लेकर घर लौट रहे थे, तभी एक मोटरसाइकिल सवार उनकी कार के पास आया और विवाद की स्थिति बनी। उनका दावा है कि उन्होंने किसी तरह का विवाद बढ़ाने के बजाय स्थिति को शांत रखने की कोशिश की।
वहीं, पुलिस की ओर से सामने आए आरोपों में कहा गया कि सड़क पर विवाद के दौरान उपाध्याय ने कथित तौर पर मोटरसाइकिल सवार के साथ मारपीट और अभद्र व्यवहार किया। मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर दोनों पक्षों के दावों में अंतर है।
पत्रकार ने लगाए गंभीर आरोप
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में अभिषेक उपाध्याय ने दावा किया कि रोड रेज की घटना से जुड़े आरोप मनगढ़ंत हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई उनकी स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़ी है। उन्होंने मामले की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस से अलग किसी एजेंसी से कराने की मांग भी की थी। याचिका में दिल्ली पुलिस या सीबीआई से जांच कराने का विकल्प भी रखा गया था।
उपाध्याय की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि कथित घटना वाले इलाके में मौजूद सीसीटीवी फुटेज को लेकर उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। उनके पक्ष ने अदालत में कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सीसीटीवी फुटेज और एफआईआर की पूरी प्रति उपलब्ध होना जरूरी है।
हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश केवल अंतरिम संरक्षण से संबंधित है। अदालत को आगे मामले के कानूनी पहलुओं और एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करनी है।
राम मंदिर चंदा मामले की रिपोर्टिंग से चर्चा में आए
अभिषेक उपाध्याय अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं से मिले चंदे और दान के प्रबंधन में कथित अनियमितताओं से जुड़ी अपनी रिपोर्टिंग को लेकर चर्चा में रहे हैं। इसी रिपोर्टिंग का उल्लेख उनकी सुप्रीम कोर्ट याचिका और अदालत में हुई सुनवाई के दौरान भी आया।
उनकी ओर से यह तर्क रखा गया कि रोड रेज मामले में दर्ज एफआईआर उनकी पत्रकारिता के बाद सामने आई और उन्हें गिरफ्तारी का डर था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आशंका को फिलहाल अंतरिम संरक्षण देकर संबोधित किया है, लेकिन एफआईआर को रद्द करने का अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। अदालत ने उन्हें एफआईआर की प्रति मिलने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी है।
7 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही गाजियाबाद पुलिस आयुक्त को एफआईआर की प्रति उपलब्ध कराने और इसकी जानकारी अदालत को देने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद अभिषेक उपाध्याय को इस एफआईआर में गिरफ्तारी समेत दंडात्मक कार्रवाई से राहत मिली है। अब आगे की कानूनी प्रक्रिया में यह तय होगा कि गाजियाबाद की एफआईआर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्या कार्रवाई होती है और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष क्या रहता है।


