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चित्रकूट की वो चीख, जो खाकी की बेरुखी में दम तोड़ गई

चित्रकूट। अक्टूबर 2020 की वह काली दोपहर आज भी चित्रकूट के उस गांव के लोगों के ज़हन में एक सिहरन पैदा कर देती है। एक 15 साल की दलित किशोरी, जिसके पास अपनी ज़िंदगी के कई ख़्वाब थे, वह न्याय की उम्मीद लिए थाने की सीढ़ियों तक तो पहुंची, लेकिन वहां उसे हमदर्दी के दो शब्द नहीं बल्कि व्यवस्था की वह पथरीली चुप्पी मिली जिसने उसका हौसला तोड़ दिया। सामूहिक दुष्कर्म की उस भयानक त्रासदी के बाद, वह मासूम न्याय की आस में पांच दिनों तक तड़पती रही, पर जब रसूखदार आरोपियों के सामने पुलिस की नीयत डगमगा गई, तो उस बेटी ने इंसाफ की गुहार लगाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा।
उस घर का सन्नाटा आज भी सवाल पूछता है कि क्या किसी गरीब और दलित बेटी की गरिमा की कीमत व्यवस्था की फाइलों में इतनी कम है? उसकी फांसी का फंदा सिर्फ एक जान जाने की कहानी नहीं थी, बल्कि उस भरोसे की हत्या थी जो एक आम नागरिक अपनी सरकार और पुलिस पर करता है। जब रक्षक ही मौन साध लें, तो एक पीड़ित किशोरी के पास अपनी आवाज़ सुनाने का आखिरी रास्ता शायद अपनी जान देना ही रह गया था। वह चली गई, पीछे छोड़ गई एक सुलगता हुआ सवाल—कि क्या वाकई हमारी बेटियां उस सिस्टम में सुरक्षित हैं, जहां अपराधियों के रसूख के आगे कानून के हाथ कांपने लगते हैं?

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Prashant Tiwari

प्रशांत तिवारी एक अनुभवी ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट, क्राइम इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर और डिजिटल मीडिया स्ट्रैटेजिस्ट हैं। उन्होंने डीडी न्यूज़ (दूरदर्शन) में बतौर डिजिटल हेड की सेवाएं दीं और प्राइम टीवी में डिजिटल मार्केटिंग मैनेजर के रूप में न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स की डिजिटल ग्रोथ, ऑडियंस एंगेजमेंट और मल्टी-प्लेटफॉर्म मीडिया स्ट्रैटेजी पर महत्वपूर्ण काम किया। क्राइम इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर उन्होंने कई न्यूज़ चैनलों के लिए अंडरकवर/स्पाई-स्टाइल रिपोर्टिंग, स्टिंग ऑपरेशन और फील्ड इन्वेस्टिगेशन किए। संगठित अपराध, साइबर क्राइम, ड्रग्स सिंडिकेट, मानव एवं गौवंश तस्करी और फर्जीवाड़े जैसे विषयों पर उनकी इन्वेस्टिगेशन चर्चित रहीं। कई संवेदनशील मामलों में उन्होंने क्षेत्रीय पुलिस को जरूरी इनपुट व सहयोग उपलब्ध कराया।

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