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महा-खुलासा: ‘शुद्ध शाकाहारी’ के बोर्ड के पीछे नॉन-वेज का ‘गंदा’ खेल; उन्नाव के इस मशहूर ढाबे में धर्म और शुद्धता से खिलवाड़!

उन्नाव: भारत में यात्रा के दौरान हाईवे पर बने ढाबे सिर्फ भूख मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि भरोसे का केंद्र होते हैं। विशेषकर ‘शुद्ध शाकाहारी’ लिखे बोर्ड को देखकर करोड़ों श्रद्धालु और शाकाहारी परिवार बिना किसी संशय के वहां भोजन करते हैं। लेकिन क्या हो जब आपको पता चले कि जिस मेज पर आप बैठकर दाल-मखनी खा रहे हैं, उसी के पीछे उन्हीं बर्तनों में नॉन वेज पकाया जा रहा है?

राजधानी मार्ग (कानपुर-लखनऊ हाईवे) पर स्थित ‘इंडियन ढाबे’ से जुड़ी एक ऐसी ही सनसनीखेज सच्चाई सामने आ रही है, जो न केवल आपकी शुद्धता पर प्रहार करती है, बल्कि प्रशासन और सिस्टम के ‘मैनेजमेंट’ के दावों की पोल खोलती है।

भरोसे का कत्ल: शाकाहार के नाम पर ‘मिक्स वेज’ का मायाजाल

कानपुर-लखनऊ मार्ग पर स्थित यह ‘इंडियन ढाबा’ रोजाना सैकड़ों यात्रियों की मेजबानी करता है। बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘शुद्ध शाकाहारी भोजनालय’ लिखा है, जिसे देखकर लोग पूरे परिवार के साथ यहां रुकते हैं। लेकिन अंदर की हकीकत बेहद खौफनाक है। सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यहां शाकाहारी खाने की आड़ में नॉन-वेज भी पकाया जाता है।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि शाकाहारी और मांसाहारी व्यंजनों के लिए न तो अलग किचन है और न ही अलग बर्तन। जिस कड़ाही में पनीर छौंका जा रहा है, संभवतः उसी में पकाए जाते हैं। नवरात्र जैसे पवित्र त्योहार सिर पर हैं, जहाँ श्रद्धालु अन्न की शुद्धता को लेकर सबसे अधिक सजग रहते हैं, ऐसे में यह ‘भ्रष्ट ढाबा संस्कृति’ सीधे तौर पर लोगों की धार्मिक आस्था और पवित्रता के साथ खिलवाड़ कर रही है।

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सफाई को ठेंगा: स्वाद के पीछे छिपी गंदगी की परतें

यहां सिर्फ धर्म का ही अपमान नहीं हो रहा, बल्कि स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ जारी है। ढाबे का एकमात्र लक्ष्य ‘अधिक लोग, अधिक मुनाफा’ है। भीड़ को जल्दी परोसने की होड़ में साफ-सफाई को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया है।

  • बर्तनों को सही तरीके से न धोना।

  • खाना बनाने के स्थान पर सड़ांध और गंदगी।

  • सब्जी और सलाद को गन्दगी में रखना।

सफाई की कमी का मुख्य कारण यह है कि ढाबा प्रबंधन को पता है कि हाईवे पर आने वाला ग्राहक एक बार आता है और चला जाता है, इसलिए ‘क्वालिटी’ से ज्यादा ‘क्वांटिटी’ पर जोर दिया जाता है।

सिस्टम का ‘मैनेजमेंट’ और सिफारिशों का कवच

सवाल यह उठता है कि आखिर यह सब खुलेआम कैसे चल रहा है? क्या स्थानीय अधिकारियों को इसकी खबर नहीं है? सच तो यह है कि जब भी आवाज उठाने की कोशिश की जाती है, उसे ‘घूस’ और ‘ऊपर की सिफारिशों’ के नीचे दबा दिया जाता है।

कहा जाता है कि इस ढाबे को कई रसूखदार व्यापारियों और स्थानीय जन प्रतिनिधियों का वरदहस्त प्राप्त है। यही कारण है कि खाद्य विभाग की टीम कभी यहां झांकने की हिम्मत नहीं करती। यदि कोई जागरूक नागरिक आवाज उठाता है, तो उल्टा उसी पर दबाव बनाकर मामला शांत करा दिया जाता है। यह ‘मैनेजमेंट’ का खेल अब आम जनता के स्वास्थ्य और धर्म पर भारी पड़ रहा है।

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क्या कहता है कानून? एक्ट और नियमों का उल्लंघन

खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (FSSAI) के तहत ऐसे ढाबों पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन यहाँ नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं:

  1. FSS Act 2006, Section 26 & 27: इसके तहत हर खाद्य विक्रेता की जिम्मेदारी है कि वह भोजन की शुद्धता और स्वच्छता सुनिश्चित करे। शाकाहारी के नाम पर मांसाहारी परोसना ‘मिसब्रांडिंग’ और ‘धोखाधड़ी’ की श्रेणी में आता है।

  2. Labeling Regulations: नियमों के अनुसार, शाकाहारी और मांसाहारी भोजन के लिए अलग-अलग रंग के चिन्ह (हरा और लाल) और अलग-अलग रखरखाव अनिवार्य है। एक ही बर्तन का उपयोग करना गंभीर अपराध है।

  3. Hygiene Ratings: सफाई के मानकों को पूरा न करने पर लाइसेंस रद्द करने और भारी जुर्माना (5 लाख रुपये तक) या जेल का प्रावधान है।

बड़ा सवाल: क्या डीएम और खाद्य विभाग जागेंगे?

अब गेंद जिला प्रशासन और खाद्य विभाग के पाले में है। क्या जिलाधिकारी उन्नाव और खाद्य सुरक्षा टीम इस ‘इंडियन ढाबे’ पर छापेमारी कर दूध का दूध और पानी का पानी करेंगे? या फिर बड़े रसूखदारों की सिफारिशों के नीचे इस मामले को भी हमेशा की तरह दबा दिया जाएगा?

आने वाले नवरात्र श्रद्धालुओं के लिए अग्निपरीक्षा हैं। यदि प्रशासन ने समय रहते इन ‘नकली शाकाहारी’ केंद्रों पर नकेल नहीं कसी, तो जनता का सिस्टम और धर्म, दोनों से भरोसा उठना लाजमी है।

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