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टेक्नोलॉजी का विकास भारत की सांस्कृतिक नींव से जुड़े रहकर ही होना चाहिए : डॉ. सच्चिदानंद जोशी
आईजीएनसीए में ‘इंडिया टेक प्लेबुक’ का विमोचन, विशेषज्ञों ने एआई, यूपीआई, डिजिटल समावेशन और उभरती तकनीकों पर की चर्चा

नई दिल्ली : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के मीडिया सेंटर ने ”सभ्यता से इनोवेशन तक: संस्कृति, टेक्नोलॉजी और भारत का आर्थिक भविष्य” विषय पर एक चर्चा और पुस्तक विमोचन कार्यक्रम आयोजित किया। इस मौके पर लेखक संतोष तिवारी की किताब ‘इंडिया टेक प्लेबुक’ लॉन्च की गई। कार्यक्रम में आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव डॉ. अरुणा शर्मा, इंडियन बेवरेज एसोसिएशन की महासचिव डॉ. गुनवीना चड्ढा, लेखक संतोष तिवारी और आईजीएनसीए के मीडिया सेंटर के प्रमुख अनुराग पुनेठा शामिल हुए।
इस अवसर पर डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यह किताब भारत की तकनीकी वृद्धि और विकास की बहुआयामी यात्रा का विस्तृत विवरण देती है। अराकू घाटी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जो इलाका कभी नक्सली गतिविधियों से प्रभावित था, वहां अब स्ट्रीट वेंडर्स और छोटे व्यापारियों तक डिजिटल पेमेंट की सुविधा पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक बदलाव किए हैं और सरकार इसे सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। साथ ही, उन्होंने आगाह किया कि हालांकि एआई की बढ़ती मौजूदगी जीवन को अधिक सुविधाजनक बना सकती है, लेकिन यह लोगों को उनके सामाजिक ढांचे और बौद्धिक क्षमताओं से दूर भी कर सकती है।
डॉ. जोशी ने कहा कि संस्कृति लोगों, उनके अनुभवों और उनकी अभिव्यक्तियों से गहराई से जुड़ी हुई है, जैसा कि भारत की श्रुति और स्मृति परंपराओं में झलकता है। उन्होंने कहा कि इन परंपराओं को संजोने और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने भारत के वैश्विक टेक्नोलॉजी लीडर बनने की आकांक्षा में डेटा संप्रभुता और सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण माना। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक नींव पर आधारित टेक्नोलॉजी देश को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है। उन्होंने एक कविता के माध्यम से टेक्नोलॉजी और मानवीय स्मृति के बीच के संबंध पर भी विचार व्यक्त किए।
डॉ. अरुणा शर्मा ने कहा कि इस किताब का एक सबसे महत्वपूर्ण संदेश ‘पूरी अर्थव्यवस्था’ और समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हर नए तकनीकी विकास के लिए ज़रूरी बैकएंड सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर का होना ज़रूरी है। इलेक्ट्रिक वाहनों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीकी तरक्की के साथ-साथ चार्जिंग स्टेशन और दूसरी ज़रूरी सुविधाओं का भी विकास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत को अहम खनिजों के क्षेत्र में शुरुआती चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बाज़ार, वर्कफ़ोर्स और ग्लोबल पहुंच ने इसकी स्थिति को मज़बूत बनाने में मदद की है। साथ ही, तकनीकी विकास करते समय इसके पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए, जिसमें अलग-अलग तरह के ऊर्जा स्रोत, विकेंद्रीकृत परमाणु तकनीकें और परमाणु कचरे से जुड़ी चुनौतियां शामिल हैं।
डॉ. शर्मा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तकनीकी विकास सभी को साथ लेकर चलने वाला (इनक्लूसिव) होना चाहिए। डिजिटल सर्वे, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और यूपीआई का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि डिजिटल टेक्नोलॉजी ने सेवाओं और फाइनेंशियल ट्रांज़ैक्शन तक पहुँच को काफ़ी बढ़ाया है। उन्होंने ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के बीच डिजिटल और फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी को तेज़ी से अपनाए जाने की बात कही, साथ ही टेक्नोलॉजी के गलत इस्तेमाल और क्रिप्टो व ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म से जुड़े जोखिमों के बारे में भी आगाह किया। ‘इंडिया टेक प्लेबुक’ को संभावनाओं का रोडमैप बताते हुए उन्होंने कहा कि एआई कमियों की पहचान करने, सही सुधार सुझाने और ज्ञान व जानकारी के आसान आदान-प्रदान में अहम भूमिका निभा सकता है।
डॉ. गुनवीना चड्ढा ने इस किताब को पाठकों को भारत की तकनीकी यात्रा से परिचित कराने की एक अहम कोशिश बताया और यूपीआई फिनटेक, मेडटेक, स्पेसटेक और एआई जैसे क्षेत्रों में हुई उल्लेखनीय प्रगति का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल पेमेंट ने फाइनेंशियल ट्रांज़ैक्शन को आसान बना दिया है और भारत ने इस क्षेत्र में ज़बरदस्त तरक्की की है। मेडटेक के क्षेत्र में, भारत की तकनीकी क्षमताओं और अपेक्षाकृत कम लागत ने इसे अफ़्रीका, मध्य पूर्व और अन्य देशों के मरीज़ों के लिए एक पसंदीदा जगह बना दिया है।
एआई के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह क्रिएटिव सेक्टर में एक मददगार टूल साबित हो सकता है, जो कलात्मक प्रतिभा को बदलने के बजाय इंसानी क्षमताओं को और बढ़ा सकता है। इलेक्ट्रिक वाहनों की तेज़ी से बढ़ती संख्या का ज़िक्र करते हुए उन्होंने तकनीकी विकास के साथ-साथ मज़बूत बैकएंड स्ट्रक्चर, सपोर्ट सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने किताब में सर्कुलर इकोनॉमी और ‘एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (ईपीआर) पर दिए गए ज़ोर की तारीफ़ की और असरदार वेस्ट मैनेजमेंट व सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए इनके महत्व को रेखांकित किया।
लेखक संतोष तिवारी ने कहा कि यह किताब अगली पीढ़ी को अहम खनिजों, एयरोस्पेस, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे उभरते हुए टेक्नोलॉजी सेक्टर से परिचित कराना चाहती है और इनमें रोज़गार व इनोवेशन की संभावनाओं को उजागर करती है। उन्होंने ‘टेक्नोलॉजी-आधारित विकास’ के महत्व पर ज़ोर देते हुए इन सेक्टरों के बीच बेहतर तालमेल और एकेडेमिया-इंडस्ट्री के बीच मज़बूत सहयोग की ज़रूरत पर बल दिया, जिसके लिए एक सहायक पॉलिसी फ्रेमवर्क की आवश्यकता है। पत्रकारिता के अपने अनुभव के आधार पर, श्री तिवारी ने कहा कि ‘इंडिया टेक प्लेबुक’ का मकसद उभरते हुए टेक्नोलॉजी बदलावों की पहचान करना और भारत के बदलते टेक्नोलॉजी परिदृश्य को पेश करना है। इसे एक शुरुआती कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि भविष्य के संस्करण 2035 और 2047 तक भारत की टेक्नोलॉजी यात्रा को रेखांकित करेंगे। उन्होंने कहा कि भारत अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों को बनाए रखते हुए और दुनिया की प्रमुख ताकतों के बीच अपनी स्थिति को मज़बूत करते हुए टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के ज़रिए विकास कर सकता है।
अनुराग पुनेठा ने कहा कि टेक्नोलॉजी, अर्थव्यवस्था और संस्कृति आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। चूँकि टेक्नोलॉजी हमारे जीवन, भाषाओं, कलाओं और सामाजिक रिश्तों को बदलती है, इसलिए इसके विकास को सांस्कृतिक नज़रिए से भी समझा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारतीय संस्कृति और मूल्य भारत के टेक्नोलॉजी और आर्थिक भविष्य के केंद्र में होने चाहिए। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय टेक्नोलॉजी न केवल कुशल होनी चाहिए, बल्कि मानवीय, समावेशी, संसाधनों के प्रति जागरूक और भारतीय मूल्यों पर आधारित भी होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी भारत की संस्कृति और विरासत से उभरने वाली नई संभावनाओं को तलाशने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि आर्थिक प्रगति तब सार्थक होती है जब समाज और उसके लोग उस प्रगति में अपनी पहचान को पहचान सकें।
इस अवसर पर कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मीडिया पेशेवर, पत्रकार और शोधार्थी शामिल हुए।




