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गंगा की गोद में पलता प्रदूषण! उन्नाव के दही औद्योगिक क्षेत्र में अवैध खेल, नोटों की गड्डियों से चल रही ‘व्यवस्था’

उन्नाव | विशेष रिपोर्ट | सूर्या शुक्ला

लखनऊ की राजधानी और कानपुर जैसे महानगर के बीच बसा उन्नाव—जिसे क्रांतिकारियों, साहित्यकारों और गंगा की पवित्र धारा की धरती कहा जाता है—आज खुद अपने अस्तित्व पर लगे सवालों से जूझ रहा है। इतिहास के पन्नों में विशेष स्थान रखने वाला यह जनपद अब दही औद्योगिक क्षेत्र में फैलते प्रदूषण और कथित अवैध गतिविधियों के कारण चर्चा में है, जहां नियमों से ज्यादा नोटों की गड्डियों की हनक सुनाई देती है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, दही औद्योगिक क्षेत्र में संचालित कुछ चुनिंदा कंपनियां लंबे समय से मनमाने तरीके से काम कर रही हैं। पर्यावरण मानकों, परिवहन नियमों और प्रशासनिक निर्देशों की खुलेआम अनदेखी हो रही है, लेकिन सुनवाई के नाम पर सिर्फ ‘मैनेजमेंट’ चलता नजर आता है। कहा जाता है कि नीचे से ऊपर तक हर स्तर पर जिम्मेदार लोग अपनी ईमानदारी को इन गड्डियों में छुपाकर कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं।


हाल ही में एक स्थानीय संगठन द्वारा सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए कुछ वीडियो ने इस पूरे तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इन वीडियो में कथित तौर पर यह देखा गया कि स्लॉटर हाउस में भेजे जाने वाले मवेशियों का अवैध परिवहन पिकअप वाहनों के जरिए खुलेआम किया जा रहा है, और प्रशासनिक अमला इस पर आंख मूंदे बैठा है। सवाल उठता है कि आखिर कौन लोग हैं जो इस अवैध कारोबार को संरक्षण दे रहे हैं?

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सूत्र बताते हैं कि यदि इन नामों को सार्वजनिक कर दिया जाए, तो लेखनी पर ही सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
बताया जाता है कि दही औद्योगिक क्षेत्र में कुछ कंपनियां जानबूझकर अमानक पिकअप वाहनों का इस्तेमाल करती हैं, ताकि जब भी आरटीओ या प्रशासन की सक्रियता बढ़े, उसे ‘मैनेज’ किया जा सके और सप्लायरों के हौसले बुलंद बने रहें। कंपनी मालिकों और उनके जनरल मैनेजर पर भी आरोप हैं कि वे सब कुछ जानते हुए अनदेखी करते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि थाना प्रभारी उनके लिए ही बैठे हैं—कोई समस्या आई तो वहीं से संभाल ली जाएगी।
सूत्रों का दावा है कि इस कथित गठजोड़ में कुछ स्थानीय नेताओं की भूमिका भी संदिग्ध बताई जाती है। जनचर्चा है कि महीने में एक-दो बार नोटों की गड्डियां पहुंचती हैं। इतना ही नहीं, कुछ कंपनियों के बाहर हर महीने एक फोर व्हीलर देखी जाती है, जिस पर कथित तौर पर “विधायक” लिखा पाया गया। यह संयोग है या संकेत—यह जांच का विषय है।
जमीनी हकीकत यह भी है कि जब प्रशासन जांच के नाम पर औद्योगिक क्षेत्र पहुंचता है, तो 15–20 मिनट की औपचारिकता निभाकर लौट जाता है। दो-तीन लोग आते हैं, ‘जांच’ करते हैं और फिर जेब खर्च निकालकर निकल जाते हैं। यदि कोई वास्तविक शिकायत या जांच की मांग उठे, तो उल्टा पीड़ित पर ही दबाव बनाया जाता है और मामला शांत करा दिया जाता है।
अब निगाहें जिलाधिकारी पर टिकी हैं। सवाल यह है कि खबरें सामने आने के बाद भी यदि सब कुछ शांत रहता है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? स्थानीय लोगों का कहना है कि जब यह पूरा मामला माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचेगा, तो उन्हें निश्चित ही पीड़ा होगी और वे तत्काल व कठोर कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे।

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Prashant Tiwari

प्रशांत तिवारी एक अनुभवी ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट, क्राइम इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर और डिजिटल मीडिया स्ट्रैटेजिस्ट हैं। उन्होंने डीडी न्यूज़ (दूरदर्शन) में बतौर डिजिटल हेड की सेवाएं दीं और प्राइम टीवी में डिजिटल मार्केटिंग मैनेजर के रूप में न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स की डिजिटल ग्रोथ, ऑडियंस एंगेजमेंट और मल्टी-प्लेटफॉर्म मीडिया स्ट्रैटेजी पर महत्वपूर्ण काम किया। क्राइम इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के तौर पर उन्होंने कई न्यूज़ चैनलों के लिए अंडरकवर/स्पाई-स्टाइल रिपोर्टिंग, स्टिंग ऑपरेशन और फील्ड इन्वेस्टिगेशन किए। संगठित अपराध, साइबर क्राइम, ड्रग्स सिंडिकेट, मानव एवं गौवंश तस्करी और फर्जीवाड़े जैसे विषयों पर उनकी इन्वेस्टिगेशन चर्चित रहीं। कई संवेदनशील मामलों में उन्होंने क्षेत्रीय पुलिस को जरूरी इनपुट व सहयोग उपलब्ध कराया।

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