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लखनऊ अग्निकांड:2016 में गिरनी थी बिल्डिंग, 2026 में 15 चिराग बुझ गए, फाइलें चलती रहीं, जवाबदेही अब भी हवा में

डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी की विशेष रिपोर्ट

लखनऊ के कोचिंग सेंटर में लगी आग ने सिर्फ दीवारें नहीं जलाईं, 15 घरों के चिराग बुझा दिए। कक्षा में बैठे छात्र-छात्राएं सपनों की कॉपी लेकर आए थे, लौटे अर्थी बनकर। माता-पिता की कोख सूनी हो गई, और सिस्टम की फाइलें फिर मोटी हो गईं।

सवाल सीधा है: आग एक दिन में नहीं लगी। इमारत की फायर NOC, इमरजेंसी एग्जिट, फायर एक्सटिंग्विशर, अवैध कंस्ट्रक्शन – ये सब एक रात में पैदा नहीं होते। जांच में खुलासा हुआ कि जिस इमारत में आग लगी वो अवैध थी। 2016 में ही गिराने का आदेश हो चुका था। फिर आदेश निरस्त कैसे हुआ? किसकी फाइल पर किसकी स्याही गिरी? 10 साल तक बिल्डिंग खड़ी रही, कोचिंग चलती रही, फीस आती रही। निरीक्षण हुए होंगे, नोटिस लगे होंगे, चाय-पानी भी चला होगा। पर दीवारें नहीं गिरीं।

मंगलवार सुबह 11 बजे SIT और फोरेंसिक टीम बैग भरकर सबूत ले गई। एडीजी जोन प्रवीण कुमार और प्रमुख सचिव पर्यटन अमृत अभिजात की टीम ने इमारत की एक-एक ईंट टटोली। पर सवाल वहीं रह गया कि सबूत 10 साल पहले क्यों नहीं जुटाए गए? लखनऊ विकास प्राधिकरण के वीसी प्रथमेश कुमार ने कहा – बिल्डिंग मालिक को 15 दिन का नोटिस, जवाब मांगा गया है, बुलडोजर चलेगा। बुलडोजर अब चलेगा जब 15 लाशें उठ चुकी हैं। 2016 में जब आदेश हुआ था तब बुलडोजर का इंजन स्टार्ट क्यों नहीं हुआ?

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पुलिस ने रामेश्वरम इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट कॉलेज के मालिक वीरेंद्र शुक्ला समेत 4 लोगों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया है। बिल्डिंग मालिक सलाखों के पीछे है।

हादसे के बाद तस्वीर वही पुरानी: पहले शोक, फिर मुआवजा, फिर “कड़ी कार्रवाई”। कार्रवाई भी निचले स्तर पर। सिक्योरिटी गार्ड सस्पेंड, क्लर्क निलंबित, चपरासी लाइन हाजिर। फाइल आगे बढ़ाने वाले बाबू पर गाज, फाइल मंजूर करने वाली कुर्सी पर मौन।

अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं? जो NOC देते हैं, जो निरीक्षण करते हैं, जो 2016 का ध्वस्तीकरण आदेश निरस्त करते हैं, जो अवैध निर्माण पर आंख मूंदते हैं – उनकी जिम्मेदारी तय कौन करेगा? सरकारी सिस्टम की शिथिलता का मतलब यही है कि गलती सबकी, सजा किसी की। निजी स्वार्थ के लिए फाइल दबाने वाले, नियम ताक पर रखने वाले – वो कुर्सी पर बैठे रहेंगे और बलि का बकरा हमेशा नीचे वाला बनेगा।

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देश का भविष्य 10×10 की क्लास में नहीं बनता, वो उन नियमों में बनता है जो कागज पर कड़े हैं पर जमीन पर लचर हैं। 15 चिराग बुझ गए। अब मुआवजा और जांच कमेटी से काम नहीं चलेगा। जवाबदेही कुर्सी से शुरू होनी चाहिए, चपरासी पर खत्म नहीं। वरना मीडिया की अगली खबर में फिर 15 नए नाम जुड़ जाएंगे।

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